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मेरे मन के गीत

मेरे मन के गीत

अरुण दिव्यांश
जिसको लिया है जीत ,
वही मेरे मन का प्रीत ,
वही तो मेरे मन में बसा ,
वही मेरे मन के गीत ।
जिसने मन वृक्ष लगाया ,
जिसने जड़ जल पटाया ,
जिसने मन बहलाने को ,
सुंदर मनबाग सजाया ।
देता मेरे मन को है शीत ,
जिसमें हमदोनों के हित ,
जिसने है दिल मिलाया ,
वही मेरे मन के गीत ।
किसी में सुंदर पुष्प खिले ,
किसे में मधुर फल लगे हैं ,
तितली उड़ती भॅंवरे गुॅंजे ,
सुंदर बगीचे सुगंध भरे हैं ।
जैसे बल देने वाला है घृत ,
जो बस चुका मेरे है चित्त ,
वही बना मेरे मन के मीत ,
वही मेरे मन के गीत ।

पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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