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अनंत प्रेम है मुझे तुमसे

प्रेम शब्दों से नहीं,आत्मा की अनुभूतियों से व्यक्त होते हैं।जब किसी की मुस्कान में पूरा संसार बस जाए,तब हृदय स्वतः कह उठता है -“अनंत प्रेम है मुझे तुमसे…

अनंत प्रेम है मुझे तुमसे

कुमार महेंद्र
तुम्हारी मंद मुस्कानों में प्रिय,
मैं हर एक क्षण खोया रहता हूँ।
तेरी पुनीत मधुरिम यादों में,
स्वप्निल होकर सोया रहता हूँ।
न कोई सीमा, न तट कोई,
मन का हर स्पंदन तुझसे ।
अनंत प्रेम है मुझे तुमसे।।


तुम ही आधार हो प्रियतम मेरे,
जीवन के इस पावन राग का।
तुमसे ही मधुमास महक उठता,
मेरे अंतर्मन के फाग का।
विरह-वेदना की यह तीव्र ज्वाला,
अब और भला मैं कहूँ किससे।
अनंत प्रेम है मुझे तुमसे।।


जैसे दीपक का अस्तित्व कभी,
बाती के बिना अधूरा रहता।
जैसे शशि का यह दिव्य रूप,
कौमुदी संग ही पूर्णत्व कहता।
उदित हुईं प्रीत की रश्मियाँ अब,
प्रणय के पावन अनुबंध से।
अनंत प्रेम है मुझे तुमसे।।


ऋतुएँ बदलें, बदले जग सारा,
चाहे बदले कालचक्र की धारा।
पर क्षीण न होगी प्राणों में मेरे,
अमिट प्रेम की पावन धारा।
मेरा रोम रोम पुलकित है,
प्रिय, तेरे ही मृदुल स्पर्श से।
अनंत प्रेम है मुझे तुमसे।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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