"भगत भूषण तिवारी पूछ रहा है"
रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"सिंहासन पर बैठे लोगों!
इतना याद दिलाने आया हूँ,
मैं भरत की पीड़ा का स्वर,
जन-जन की व्यथा सुनाने आया हूँ।
कब तक सत्य दबाओगे तुम,
कब तक प्रश्नों को मोड़ोगे?
कब तक वर्दी की ओट लेकर,
जनता का विश्वास तोड़ोगे?
यह धरती भगत सिंह की है,
यह धरती बलिदानों की है,
यहाँ लहू ठंडा पड़ता नहीं,
यह माटी इंकलाबों की है।
जो अन्यायों से टक्कर लेता,
उसको कौन झुका सकता है?
तन भले मिट जाए जग से,
विचार कहाँ मिट सकता है?
हर बूँद लहू की पूछ रही,
क्या इतना ही अधिकार मिला?
सच कहना यदि अपराध हुआ,
तो कैसा यह लोकतंत्र भला?
माँ रोती है, बहन बिलखती,
आँखों में अंगार लिए,
युवा खड़ा चौराहों पर है,
सीने में हुंकार लिए।
सुन लो सत्ता के गलियारों!
जनता सब पहचान रही है,
किसके हाथों न्याय सुरक्षित,
नीयत सबकी जान रही है।
मत समझो चुप बैठा जनमन,
सब कुछ सहकर हार गया है,
अंदर-अंदर धधक रहा जो,
वह ज्वालामुखी तैयार खड़ा है।
भरत भूषण की यह गाथा,
घर-घर तक दोहराई जाएगी,
जब-जब अन्याय खड़ा होगा, यह आवाज़ सुनाई जाएगी।
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