हृदय की धड़कन में, अब तुम्हारा ही स्पंदन
कुमार महेंद्रतुम स्पर्शमयी पीयूष-धारा बन,
मेरे उर में बहती हो।
मैं मौन रहूँ तो भी प्रियतम,
तुम नयनों से सब कहती हो।
मेरे सूने एकांत-गगन पर,
तुम चंद्रकिरणों का मंडन।
हृदय की धड़कन में, अब तुम्हारा ही स्पंदन।।
जो बिखर गया था काल-चक्र में,
उस जीवन को तुमने सँवारा है।
इस पथभ्रष्ट थके पथिक को,
तेरी साँसों का मिला किनारा है।
अब शब्द, स्वर और भाव सभी,
करते हैं तेरे प्रणय का अभिवंदन।
हृदय की धड़कन में, अब तुम्हारा ही स्पंदन।।
तुम्हारी मृदुल हँसी की सरगम से,
मेरी तिमिरमयी रातें गाती हैं।
जब तुम पास नहीं होती प्रिय,
परछाइयाँ भी सहम-सी जाती हैं।
तुम केवल मेरी प्रीति नहीं,
तुम ही हो नेह-साधना का चंदन।
हृदय की धड़कन में, अब तुम्हारा ही स्पंदन।।
मैं तुममें यूँ विलीन हो जाऊँ,
ज्यों सरिता सिंधु में समाती है।
तेरे नेहामृत की वर्षा से,
जीवन-वीणा फिर मुस्काती है।
सदियों की अतृप्त मरुभूमि पर,
तुम करती प्रेम-सुधा का वंदन।
हृदय की धड़कन में, अब तुम्हारा ही स्पंदन।।
तेरे नाम का दीप जला तो,
मन का तम पल में ढलता है।
तेरे सानिध्य के स्पर्श मात्र से,
हर पीड़ित भाव सँभलता है।
अब प्राणों के पावन मंदिर में,
होता है तेरा ही अभिनंदन।
हृदय की धड़कन में, अब तुम्हारा ही स्पंदन।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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