तुलसी
दूर करो हर व्याधि माँविषाणुओं का कर के संहार
कर जोड़ करते हैं विनती तुमसे
पावन कर दे ये हवा।
तुम धरा की आभूषण हो,
माटी की हो रक्षक
मेरे आंँगन की शोभा हो तुम
करती हुँ मैं नित अभिनंदन।
तुम प्राण वायु, तुमसे नेह है खास
तुम पर जल चढ़ाऊ सुबहो शाम।
तुम औषधि और शुद्धता भी तुम
पूजनीय, वंदनीय, अभिनंदनीय
तेरी खुशबू सबको भाती,
तेरी पत्तियाँ हैं सबसे खास
रोगों का करके उपचार
करती हो सबका उपकार।
तेरे होने से जीवन मेरा
खुशियों से है ओत-प्रोत,
फलते-फूलते रहना हरदम,
बना रहेगा तेरा नाम।
घर आंँगन में सजे जब तुलसी
और चौरे पर जले दीया,
देख-देख कर इठलाती बगिया बारम्बार हुलसे जिया।
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