चली गईं वो एकाएक
अनमोल कुमार
चली गईं वो एकाएक, छोड़कर आँगन सूना,
जिनके हाथों में बसी थी घर की हर धूप-छाँव।
राकेश जी के जीवन की वो थीं प्रीत की डोर,
आज टूट गई वो डोर, रह गया बस एक शोक।
हँसी-खुशी के गीत अब यादों में बदल गए,
चाय की चुस्की में भी अब सन्नाटा भर गया।
जो देखती थी सपना संग-संग बुढ़ापे का,
वो सपना अधूरा रह गया, आँख नम हो गई।
हे प्रभु! उस पुण्य आत्मा को अपने चरणों में स्थान देना,
और मित्र राकेश को इस अग्नि परीक्षा में संबल देना।
दुःख की इस रात के बाद सवेरा जरूर आएगा,
आप अकेले नहीं हैं, हम सब आपके साथ हैं।
ॐ शांति शांति शांति
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