धरती है मेरी मां
दुर्गेश मोहनधरती है मेरी मां,
सबसे है प्यारी।
यह है आदरणीया ,
सबकी है न्यारी।
यह दुनिया के लिए,
है सृजित।
ये सभी के लिए,
है पूजित।
धरती सबको,
है संवारती।
सभी इनकी उतारती ,
है आरती।
यह सृष्टि का करती,
है पालन।
दुःखों का करती,
है हरण।
ये दुश्मनों का करती,
है भक्षण।
अपनों को देती,
है शरण।
पेड़_पौधे,खनिज आदि
ये देती हैं पर्याप्त।
पेड़_पौधे से ऑक्सीजन भी
होता है प्राप्त।
दुर्गेश मोहन बिहटा, पटना (बिहार)
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