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बदलता वेश बदलती सभ्यता

बदलता वेश बदलती सभ्यता

जय प्रकाश कुवंर
भारत की बदलती पहनावा सभ्यता के बारे में,
कुछ लिखने में अब शर्म आ रही है।
देखते देखते ऐसा बदलाव हो जाएगा,
सब कुछ लेखनी से लिखी नहीं जा रही है।।
मोबाईल पर फोटो में नग्नता परोस कर,
पुछा जाता है, मेरा रूप कैसा लग रहा है।
हमारी वर्षों पुरानी भारतीय सभ्यता मर रही है,
यह एक नया असभ्य युग जग रहा है।।
हमारे पुर्वज और हमारा समाज ऐसा न था,
हमारा भारतीय रहन सहन कभी ऐसा न था।।
हमारी माताओं बहनों के सर पर पल्लू था,
उनका वेष भूसा पहनावा आज के जैसा न था।।
अब न जाने हमारी भारतीय सभ्यता को क्या हो गया है।
हमारी नयी पीढ़ी को न जाने किसका नजर लग गया है।।
सुंदरता तो भारतीय सभ्यता की धरोहर रही है।
रंग चाहे गोरा हो या सांवला हो,
भारतीय सुंदरता की उपमा दी जाती रही है।।
साड़ी में आंचल से अपना तन ढक कर,
भारतीय नारियाँ कितनी सुंदर लगती रही हैं।
ऐसी भारतीय बालाओं को वरण हेतु,
राजाओं के यहाँ स्वयंवर रची जाती रही हैं।।
भारत अब भी वही है, भारतीय सभ्यता पूरी मरी नहीं है।
यह नग्नता और फुहड़पन समाज में परोसना,
किसी भी लिहाज से भारतवर्ष में सही नहीं है।।
रूप और प्रेम प्रकृति की देन है,
इसे ढक कर रखने से ज्यादा उभरता है।
असभ्यता का प्रदर्शन करने से रूप और प्रेम,
ज्यादा टिकता नहीं, बल्कि यह जल्दी ही मरता है।।
पहले लगता था, पश्चिम हम पुरब वालों को ठग रहा है।
लेकिन अब तो हम नग्नता में पश्चिम वालों से,
बहुत आगे बढ़ गये हैं, ऐसा देखने से लग रहा है।।
हम भारतीयों को सुंदरता का प्रदर्शन,
अपनी भारतीय सभ्यता के अनुकूल करना होगा।
पश्चिमी सभ्यता के चपेट में यह क्रम टूटता गया तो,
इसका खामियाजा देश में, हर मां बाप को भरना होगा।।

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