"आत्मबोध और भाग्य का आलोक"
पंकज शर्माप्रिय मित्रों मनुष्य का भाग्य किसी अदृश्य शक्ति की मनमानी रचना नहीं, बल्कि उसके अंतर्मन में अंकित आत्मबोध का प्रतिफल होता है। वह स्वयं को जिस दृष्टि से देखता है, उसी के अनुरूप उसके विचार, संकल्प एवं कर्म आकार ग्रहण करते हैं। यदि वह अपने भीतर केवल सीमाएँ देखता है, तो उसके जीवन की दिशाएँ भी संकुचित हो जाती हैं; किंतु जो अपने अस्तित्व में संभावनाओं का प्रकाश अनुभव करता है, उसके लिए प्रत्येक बाधा एक नवीन अवसर बन जाती है। आत्मदृष्टि ही जीवन की प्रथम नियति है।
वास्तव में, हमारा भाग्य भविष्य में लिखी हुई कोई रहस्यमयी पंक्ति नहीं, बल्कि वर्तमान में पोषित विश्वासों का क्रमिक विस्तार है। आत्मविश्वास से युक्त व्यक्ति प्रतिकूलताओं में भी मार्ग खोज लेता है, क्योंकि वह स्वयं को पराजित नहीं मानता। अतः मनुष्य को अपने भीतर ऐसी दृष्टि विकसित करनी चाहिए जो उसे उसकी वास्तविक सामर्थ्य का बोध कराए। जब आत्मा स्वयं के गौरव को पहचान लेती है, तब भाग्य भी उसी पहचान का उज्ज्वल प्रतिबिंब बनकर प्रकट होता है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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