जमाने का खेल
संजय जैनबैठाया जिनको हमने
सदा ही अपनी पलको पर।
उन्होंने ही मुझको
गिरा दिया सबकी नजरो में।
जमाने का ये दस्तूर है
जो अपनो को मिटाता है।
किस का रंग लेकर के
किसी और को लगाता है।।
जहाँ अपने ही बन जाये
अपनो के दुश्मन जब।
तो अनिश्चिता आयेगी
हमारे आपके जीवन में।
जिंदगी की यही तो
एक सच्ची कहानी है।
तुम्हारी हंसकर गुजर रही
तो क्या हमारी रोकर गुजरेगी।।
बहुत देखे है हमने
अपने अबतक के जीवन में।
जहाँ अपनों से ज्यादा
उनकी यादें रोज आती है।
संभल जाए ये दिल तो
हमारे लिए अच्छा है।
नही तो ठोकर खाना ही
हमारी तुम्हारी किस्मत है।।
जहाँ से जो आते है
कहाँ उनको जाना है।
बड़ा अजीब सा खेल
कुदरत ने जो खेलना है।
न वो समझ पाये है
और न हम समझ पायें है।
और सारा दोष पर हम
जमाने को दे रहे है।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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