शब्द-शब्द कान्हा, अक्षर-अक्षर राम
कुमार महेंद्रअंतर में गूँजे अनवरत,
इनका ही मधुमय स्वर।
हृदय-गगन के दिव्य वितान में,
आदि-अनादि भाव मुखर।
कृष्ण मेरी चेतना बने हैं,
राघव मेरे पुनीत प्राण।
शब्द-शब्द कान्हा, अक्षर-अक्षर राम।।
प्रेम-सुधा की यमुना कान्हा,
मर्यादा की सरयू राम।
एक सिखाएँ नेह-समर्पण,
एक रचें धर्म का धाम।
एक बाँसुरी की तान सुनाएँ,
एक करें लोक-कल्याण।
शब्द-शब्द कान्हा, अक्षर-अक्षर राम।।
हर लेते मानस के तम को,
मिटा देते समस्त संताप।
वाणी में मधुरस घोलकर,
बरसाते कृपा-प्रसाद।
मोहन की मुरली में गूँजे,
जीवन का शुभ गान।
शब्द-शब्द कान्हा, अक्षर-अक्षर राम।।
इन्हीं दो नामों में निहित है,
सृष्टि का संपूर्ण विधान।
इनकी छाया में ही मिलता,
भक्ति-सुधा का वरदान।
ज्ञान-सिंधु श्रीराम विराजें,
श्याम प्रेम-निधि महान।
शब्द-शब्द कान्हा, अक्षर-अक्षर राम।।
अक्षर-अक्षर संयम झलके,
शब्द-शब्द अनुराग।
राम-नाम पथ दीप्त करता,
कृष्ण जगाएँ प्रीत-विराग।
एक मुक्ति का द्वार दिखाएँ,
एक बने प्रणय की शान।
शब्द-शब्द कान्हा, अक्षर-अक्षर राम।।
कण-कण में जिनकी छवि बसती,
अणु-अणु जिनका धाम।
भक्त-हृदय की प्रत्येक धड़कन,
जपती उनका दिव्य नाम।
आदि-अनंत, अखिल ब्रह्मांड के,
वे ही परम प्रमाण।
शब्द-शब्द कान्हा, अक्षर-अक्षर राम।।
नयन-नयन में श्याम समाए,
श्वास-श्वास श्रीराम।
जीवन की हर पावन धारा,
करती उनका यशगान।
महिमा जिनकी वेद न गा पाएँ,
कैसे करूँ उनका गुणगान।
शब्द-शब्द कान्हा, अक्षर-अक्षर राम।।
कुमार महेंद्र(स्वरचित मौलिक रचना)
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