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अद्भुत विकास

अद्भुत विकास

जय प्रकाश कुवंर
पेड़ काटकर, फोर लेन, सिक्स लेन,
तेज रफ्तार सड़क हमने बना दिया।
तो अब चिड़ियों ने भी बेघर होकर,
सुबह सुबह चहकना छोड़ दिया।।
हमनें पेड़ काट डाले,
कुछ पंक्षियों को बनाये निवाले।
कुछ चिड़ियों को कैद कर,
हमने शौक के लिए,पिंजरे में डाले।।
सुबह सुबह मुर्गा बांग देते थे,
अब मुर्गा हमारा टेस्टी निवाला है।
हमने अपने हाथों ही,
अपना कब्र खोद डाला है।।
अब सुबह सुबह उनकी चहचहाट ,
और बांग के लिए,
कान और दिल तरसते हैं।
अब सुबह हो या शाम हो,
सिर्फ गाड़ियों के हार्न का पें पें सुनते हैं।।
चिड़ियों की चहचहाट गुम हुई,
आदमी की चहचहाट बढ़ गई।
अब तो बस चौबीस घंटे टीभी पर,
राजनीतिक चर्चा और चहचहाट सुनते हैं।।
कर्णप्रिय पंछियों की आवाज गुम हुई।
कानों में चुभने वाली,
एक दूसरे को नीचा दिखाने वाली,
हर जगह बहस लगती छिड़ गई।।
जबसे भौतिक विकास शुरू हुआ।
मनुष्य का मौलिक विकास रूक गया।।
अब तो मनुष्य के दिमाग में,
तरह तरह का जहर भरा जा रहा है।
हमने कुछ भौतिक सुखों के लिए,
नैसर्गिक सुख खो दिया, यही समझ में आ रहा है।।

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