जहान नगर (जहानाबाद) का सांस्कृतिक विरासत
सत्येन्द्र कुमार पाठक
बिहार के मध्य में स्थित जहानाबाद (ऐतिहासिक नाम: जहान नगर) केवल एक प्रशासनिक भूखंड नहीं है, बल्कि यह भारत के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास का जीवंत और धड़कता हुआ अध्याय है। गया और पटना (प्राचीन अजीमाबाद व पाटलिपुत्र) के मध्य स्थित यह क्षेत्र सदियों से विचारकों, ऋषियों, राजाओं और सूफी संतों की कर्मभूमि रहा है। उत्तर में पुनपुन और मध्य में दरधा-जामुन जैसी पवित्र नदियों से सिंचित यह क्षेत्र पौराणिक 'कीकट प्रदेश' और 'मगध साम्राज्य' का वह हृदयस्थल है, जिसने भारत को एक सूत्र में पिरोने वाले महान मौर्य और गुप्त साम्राज्यों के उत्थान को अपनी आंखों से देखा है। शहजादी जहांआरा के नाम पर 'जहान नगर' कहलाने से बहुत पहले, यह भूमि जाह्नू ऋषि की तपोस्थली और पंच-उपासना प्रणालियों का महासंगम थी। यह आलेख सतयुग की ऋषि संस्कृति से लेकर आधुनिक काल के प्रशासनिक विकास तक, जहानाबाद की इस गौरवशाली यात्रा को इसके संपूर्ण भौगोलिक, धार्मिक और सामाजिक परिवेश के साथ उद्घाटित करता है।
सतयुग: राजर्षि जह्नू का साम्राज्य और ऋषि संस्कृति की नींव में जहानाबाद के इतिहास की जड़ें सतयुग की पावन ऋषि संस्कृति से जुड़ी हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, चंद्रवंशी राजा अजमीढ़ के प्रतापी पुत्र राजर्षि जह्नू ने राजसी ऐश्वर्य का त्याग कर मगध के इसी वनांचल और पर्वत श्रृंखलाओं (वर्तमान बराबर की पहाड़ियों के आस-पास) को अपनी तपोभूमि बनाया था। यहाँ उन्होंने एक महान 'सर्वमेध यज्ञ' का अनुष्ठान किया था। लोक-कथाओं और पुराणों में वर्णित है कि जब गंगा का तीव्र वेग उनकी कुटिया और यज्ञ-सामग्री को बहा ले गया, तो क्रोधित होकर महर्षि जह्नू ने अपने तपोबल से पूरी गंगा नदी को पी लिया था। बाद में, देवताओं और राजा भगीरथ के करबद्ध प्रार्थना करने पर उन्होंने गंगा को अपनी जंघा (या कान) के मार्ग से पुनः मुक्त किया, जिसके कारण गंगा का एक नाम 'जाह्नवी' पड़ा। जाह्नू ऋषि के इसी प्रभाव क्षेत्र को 'जह्नू साम्राज्य' कहा गया, जो शुद्ध ब्रह्म-ज्ञान, तपस्या और वैदिक ऋषियों की शरणस्थली था। इस युग में सोइया घाट और उसके आस-पास का क्षेत्र ऋषियों के आश्रमों से जीवंत था।
त्रेतायुग में यह क्षेत्र महर्षि विश्वामित्र के सुप्रसिद्ध 'सिद्धाश्रम' के प्रभाव क्षेत्र और मगध के घने जंगलों के अंतर्गत आता था। जब भगवान श्रीराम और अनुज लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ बक्सर के सिद्धाश्रम में ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों का वध करने के बाद मिथिला (जनकपुर) की ओर बढ़ रहे थे, तब इस क्षेत्र के ऋषि आश्रमों में भी उनके चरण पड़े थे। इस काल में यहाँ की ऋषि संस्कृति ने शस्त्र और शास्त्र के समन्वय को देखा। उटा, कन्नौदी और मदारपुर जैसे क्षेत्रों के प्रागैतिहासिक संदर्भ बताते हैं कि यहाँ वैदिक यज्ञों की रक्षा के लिए ऋषियों के बड़े-बड़े केंद्र स्थापित थे। द्वापर युग: सम्राट जरासंध का सैन्य तंत्र और कीकट प्रदेश का पराक्रम में द्वापर युग में इस भूमि का राजनीतिक और सामरिक महत्त्व अपने चरम पर पहुँच गया। यह काल बृहद्रथ वंश के महान राजा वसु, सम्राट बृहद्रथ और उनके अजेय पुत्र जरासंध का था। जहानाबाद का यह संपूर्ण क्षेत्र जरासंध की राजधानी गिरिव्रज (राजगीर) का मुख्य सुरक्षा कवच और सैन्य मार्ग था। महाभारत काल में इस क्षेत्र को 'कीकट प्रदेश' भी कहा गया। जरासंध ने मल्ल युद्ध और अपनी विशाल चतुरंगिणी सेना के संचालन के लिए जहानाबाद के मैदानी भागों का उपयोग रसद केंद्र और सैन्य छावनी के रूप में किया था। जरासंध स्वयं भगवान शिव का परम भक्त था, और उसके काल में इस क्षेत्र में शैव और शाक्त मत का भारी प्रचार-प्रसार हुआ। बुढ़वा महादेव मंदिर की मूल स्थापना को इसी कालखंड के वैचारिक प्रभाव से जोड़कर देखा जाता है। कलियुग (प्राचीन से मध्यकाल): कलियुग के प्रारंभ और ऐतिहासिक कालखंड में जहानाबाद विश्व इतिहास के पटल पर चमक उठा: नंद और मौर्य काल: चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य और विशेषकर सम्राट अशोक के काल में जहानाबाद का 'बराबर पहाड़' (Barabar Hills) वैश्विक वास्तुकला और धार्मिक सहिष्णुता का केंद्र बना। अशोक और उनके पौत्र दशरथ ने बराबर और नागार्जुन की कठोर ग्रेनाइट पहाड़ियों को तराशकर आजीवक संप्रदाय के भिक्षुओं के लिए विश्व की सबसे प्राचीन मानव-निर्मित गुफाओं (लोमस ऋषि गुफा, सुदामा गुफा) का निर्माण करवाया।
शुंग काल: मौर्यों के पतन के बाद पुष्यमित्र शुंग के काल में यहाँ वैदिक संस्कृति और कला का पुनरुत्थान हुआ।
गुप्त काल: गुप्त साम्राज्य के दौरान इस क्षेत्र को 'स्वर्ण युग' का संरक्षण मिला। बराबर पहाड़ की चोटी पर स्थित सिद्धेश्वर नाथ मंदिर का जीर्णोद्धार और गुप्तकालीन लिपियों वाले शिलालेख इसके प्रमाण हैं।
हर्षवर्धन और सेन काल: कन्नौज के सम्राट हर्षवर्धन और बाद में बंगाल के पाल व सेन शासकों के काल में यहाँ मूर्तिकला के बड़े केंद्रों का विकास हुआ। कन्नौदी और उटा जैसे गाँवों से प्राप्त होने वाली प्राचीन पालकालीन और गुप्तकालीन मूर्तियाँ इस बात की गवाही देती हैं कि यह क्षेत्र कलात्मक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध था।
मुगलकाल: 'जहान नगर' का उदय और सूफी मत का आगमन - मध्यकाल में इस क्षेत्र का नामकरण और प्रशासनिक स्वरूप आधुनिकता की ओर बढ़ा। मुगल बादशाह शाहजहाँ के शासनकाल में उनकी विदुषी और शक्तिशाली पुत्री शहजादी जहांआरा का ध्यान इस क्षेत्र की सामरिक स्थिति पर गया। यह स्थान पटना और गया के व्यापारिक मार्ग के बीच एक आदर्श पड़ाव था। जहांआरा के निर्देश पर यहाँ एक विशाल शाही सराय, मंडी और विश्रामगृह का निर्माण कराया गया। शहजादी जहांआरा के नाम पर ही इस पूरे परगने को 'जहान नगर' नाम दिया गया, जो कालान्तर में स्थानीय बोलचाल में अपभ्रंश होकर 'जहानाबाद' बन गया। इस काल में शेरशाह सूरी की प्रशासनिक व्यवस्था और बाद में मुगलों के संरक्षण में निजामुद्दीनपुर, मदारपुर और शहबाजपुर जैसे कस्बे विकसित हुए। इसी दौर में यहाँ सूफी संतों का आगमन हुआ, जिन्होंने तलवार के बजाय प्रेम और अध्यात्म से लोगों के दिलों को जीता। अंग्रेजों के भारत आगमन के बाद जहानाबाद को एक नए प्रशासनिक ढांचे में ढाला गया। नील की खेती और गया-पटना मार्ग पर नियंत्रण रखने के लिए अंग्रेजों ने 1872 में जहानाबाद को गया जिले के अंतर्गत एक अनुमंडल के रूप में स्थापित किया। एरोड्रम (हवाई पट्टी): सामरिक दृष्टिकोण और सेना की त्वरित आवाजाही के लिए अंग्रेजों ने यहाँ एक 'एरोड्रम' (हवाई पट्टी) का निर्माण कराया, जो उस काल में इस क्षेत्र के बड़े प्रशासनिक कद को दर्शाता है।चर्च की स्थापना: ब्रिटिश अधिकारियों, मिशनरियों और स्थानीय एंग्लो-इंडियन आबादी के लिए शहर में पाश्चात्य स्थापत्य शैली में एक चर्च का निर्माण कराया गया, जो आज भी शहर की सांस्कृतिक विविधता का हिस्सा है। राजबाजार का विकास: ब्रिटिश काल में राजबाजार अनाज, वस्त्र और नील के व्यापार का एक बहुत बड़ा क्षेत्रीय केंद्र बनकर उभरा।
स्वतंत्रता संग्राम में जहानाबाद की जनता और यहाँ के स्वतंत्रता सेनानियों (जैसे शहबाजपुर और टेनी बीघा के निवासियों) ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। आजादी के बाद, सामाजिक-आर्थिक चेतना के विस्तार और कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से 1 अगस्त 1986 को जहानाबाद को एक स्वतंत्र जिले का दर्जा दिया गया। तब से लेकर आज तक जिला प्रशासन के नेतृत्व में यहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और अवसंरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं।
जहानाबाद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भारत की पाँच प्रमुख धार्मिक धाराओं—सौर, शाक्त, ब्रह्म, शैव, और वैष्णव—का एक ऐसा समन्वय स्थल है, जहाँ विरोधाभास नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व देखने को मिलता है। यह सब यहाँ की मूल ऋषि संस्कृति के कारण संभव हो सका है। मगध का पूरा क्षेत्र भगवान सूर्य की आराधना के लिए प्रागैतिहासिक काल से प्रसिद्ध है। जहानाबाद का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। यहाँ के ग्रामीण अंचलों में प्राचीन सूर्य तालाब और सूर्य मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं। लोक-आस्था का महापर्व छठ, जो प्रकृति और सूर्य की साक्षात उपासना है, यहाँ की सौर संस्कृति का सबसे प्रदीप्त उदाहरण है। कन्नौदी और धनगवां जैसे क्षेत्रों में सूर्य देव की प्राचीन प्रतिमाएं आज भी पूजी जाती हैं।शाक्त संस्कृति - जहानाबाद में शक्ति पूजा की जड़ें बहुत गहरी हैं। बराबर की पहाड़ियों की कंदराओं में प्राचीन काल से ही तांत्रिक और सात्विक शक्ति साधक अपनी साधना करते आए हैं। कको गद्दी और धनगवां गाँवों में माँ दुर्गा, चंडी और शीतला माता के प्राचीन मंदिर हैं। यहाँ ग्रामीण स्तर पर 'डीहवारिन माई' (गाँव की रक्षक देवी) के रूप में शाक्त मत का लोक-स्वरूप हर बस्ती में दिखाई देता है। सोइया घाट की देवी विभूक्षणी , नक कटी स्थल था ।
जह्नू ऋषि की परंपरा से उपजी 'ब्रह्म संस्कृति' ने इस भूमि को वैचारिक स्वतंत्रता दी। यही कारण था कि जब कलियुग के संधिकाल में रूढ़िवादिता बढ़ी, तो इसी भूमि ने आजीवक संप्रदाय, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के भिक्षुओं को पनाह दी। बराबर की गुफाएँ (सुदामा और लोमस ऋषि) इसी ब्रह्म-चिन्तन और ध्यान की साक्षी हैं, जहाँ बैठकर भिक्षु संसार के दुखों से परे 'ब्रह्म' या 'शून्य' की खोज करते थे। शैव संस्कृति - जहानाबाद मूलतः शिव की भक्ति में सराबोर रहा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण शहर के मध्य स्थित बुढ़वा महादेव मंदिर है। बुढ़वा महादेब मंदिर जहानाबाद की प्राचीनतम धरोहरों में से एक है। यहाँ स्थापित शिवलिंग अत्यंत प्राचीन है। स्थानीय जनमानस में मान्यता है कि यहाँ मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। सावन के महीने में पूरा जहानाबाद 'हर-हर महादेव' के उद्घोष से गूंज उठता है।
इसके अतिरिक्त, बराबर पहाड़ पर स्थित सिद्धेश्वर नाथ मंदिर (जिन्हें मगध का बाबा धाम भी कहा जाता है) गुप्तकाल से ही शैव संप्रदाय का एक महान केंद्र रहा है।
मध्यकाल के अवसान और आधुनिक काल की शुरुआत में जहानाबाद के ग्रामीण समाज को एक सूत्र में बांधने का श्रेय वैष्णव मत को जाता है। 'ठाकुरबाड़ि संस्कृति ' (राधा-कृष्ण और सिया-राम के मंदिर) स्थापित की गईं। ये ठाकुरबाड़ियाँ केवल पूजा-स्थल नहीं थीं, बल्कि ये गाँवों के सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र थे। यहाँ 'अष्टयाम', 'भजन-कीर्तन' और सामूहिक भोज (भंडारे) होते थे, जिन्होंने जाति-पांत के बंधनों को ढीला कर समाज में समरसता का संचार किया है । ठाकुरबाड़ी मंदिर में पांचलिंगी शिव , ठाकुर जी , भगवान सूर्य , चित्रगुप्त मंदिर है ।
जहानाबाद की भौगोलिक बनावट ने इसके इतिहास और संस्कृति को गढ़ने में मुख्य भूमिका निभाई है।दरधा-जामुन (यमुना) संगम - जहानाबाद शहर के समीप दरधा और जमुनी (स्थानीय नाम यमुना) नदियों का पवित्र संगम होता है। ये नदियाँ छोटानागपुर के पठार से मोरहर नदी से निकलकर उत्तर की ओर बहती हैं। मानसून के समय इन नदियों का सौंदर्य देखते ही बनता है। इस संगम स्थल पर सदियों से कार्तिक पूर्णिमा और माघी पूर्णिमा छठब्रत जैसे अवसरों पर स्नान और मेलों का आयोजन होता रहा है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था और संस्कृति का मुख्य हिस्सा है।
सोइया घाट का भूगर्भ से प्रवाहित जल - प्राकृतिक चमत्कारों की बात करें तो सोइया घाट का नाम सर्वोपरि है। यहाँ दरधा नदी के घाट पर भूगर्भ (जमीन के नीचे) से स्वतः ही शुद्ध और शीतल जल की धाराएं प्रवाहित होती रहती हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह एक प्राकृतिक चश्मा या भूमिगत जलस्रोत हो सकता है, लेकिन लोक-संस्कृति में इसे देवताओं का आशीर्वाद और जाह्नू ऋषि के तप का प्रताप माना जाता है। लोग इस जल को पवित्र मानकर अपने घरों में ले जाते हैं। सोइया घाट पर तंत्र यंत्र मंत्र स्थल पर शाक्त संस्कृति की देवी विभूक्षणी , नक कटी देवी मंदिर स्थापित थी ।
विभूक्षणी जल प्रणाली में स्थानीय कृषि और जल प्रबंधन के इतिहास में 'विभूक्षणी' नहर और जल-वितरिका प्रणाली का बड़ा योगदान रहा है। इसने दरधा और जामुन के पानी को सुदूर गाँवों (जैसे धनगवां, उटा, कन्नौदी) के खेतों तक पहुँचाकर इस सूखाग्रस्त क्षेत्र को हरित क्रांति से जोड़ा जहानाबाद का असली वैभव इसके गाँवों, कस्बों और शहरी मोहल्लों में बिखरा हुआ है। जहानाबाद का मुख्य व्यावसायिक केंद्र मलहचक , ठाकुरबाड़ी मोहल्ला , पाठकटोली , पंचमहल्ला , ढ़िबरा पर , शेखालम चक , नया टोला , नागाश्रम , गड़ेड़िया खंड ,विशुनगंज ,प्यारी माहला , रामगढ़ , दिलानपुर , गोरक्षणी , राजबाजार , एरकी , दौलतपुर है। ब्रिटिश काल से ही यह मंडी के रूप में प्रसिद्ध रहा है। आज यह आधुनिक व्यापार, शिक्षा और संस्कृति का कोलाहल पूर्ण केंद्र है। निजामुद्दीनपुर: मोहल्ला सूफी संस्कृति, मुगलकालीन जमींदारी और गंगा-जमुनी तहजीब का जीवंत उदाहरण है। यहाँ की प्राचीन इमारतें और मजारें मध्यकालीन जहान नगर की याद दिलाती हैं। मदारपुर ऐतिहासिक रूप से सूफी मत के प्रसिद्ध 'मदारिया सिलसिले' (शाह मदार के अनुयायियों) से प्रभावित रहा है। यहाँ के सूफी संतों ने स्थानीय हिंदू और मुस्लिम आबादी के बीच प्रेम और आपसी भाईचारे का ऐसा बीज बोया, जो आज भी सांप्रदायिक सौहार्द के रूप में फलीभूत हो रहा है। उटा और कन्नौदी: ये दोनों गाँव जहानाबाद के बौद्धिक और सांस्कृतिक स्तंभ रहे हैं। यहाँ स्थित प्राचीन ठाकुरबाड़ियों और जमींदारों के संरक्षण में संस्कृत पाठशालाओं की शुरुआत हुई, जिन्होंने बाद में आधुनिक शिक्षा की नींव रखी। यहाँ से पालकालीन खंडित मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं। टेनी बीघा और शहबाजपुर: ये क्षेत्र कृषि प्रधान चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रदूत रहे हैं। यहाँ के किसानों ने स्वामी सहजानंद सरस्वती के किसान आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था।
धनगवां जैसे गाँव मगध की पारंपरिक ग्रामीण संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ संयुक्त परिवार, कृषि उत्सव (जैसे नवान्न, सोहराय) और लोकगीतों (जैसे चैता, कजरी) की परंपरा आज भी अक्षुण्ण है।
ब्रिटिश अनुमंडल से आधुनिक जिला प्रशासन तक जहानाबाद का प्रशासनिक सफर इसकी प्रशासनिक आवश्यकताओं और जनता के संघर्षों की कहानी है। गया जिया के अंतर्गत ब्रिटिश साम्राज्य काल में 1872 ई में जहानाबाद अनुमंडल , सामरिक विकास में एरोड्रम एवं चर्च ,कोर्ट , अस्पताल , रेलवे स्टेशन की स्थापना और 01 अगस्त 1986 में जहानाबाद पूर्ण स्वतंत्र जिला घोषित हुआ । जिला प्रशासन द्वारा कानून व्यवस्था , शिक्षा ,वी पर्यटन बराबर पर्वत समूह का विकास हुआ ।
-ब्रिटिश काल (1872) में जब जहानाबाद अनुमंडल बनाया गया, तब यहाँ मुनसिफ कोर्ट और जेल की स्थापना की गई ताकि इस अशांत और सामरिक क्षेत्र पर नियंत्रण रखा जा सके। : गया से अलग होकर जब जहानाबाद जिला 01 अगस्त 1986 में बना, तो प्रथम जिला पदाधिकारी हेमचंद सिरोही भा प्र से और पुलिस अधीक्षक सुरेश कुमार भारद्वाज भा पु से के नेतृत्व में 'जिला प्रशासन' का ढांचा तैयार हुआ। आज का जिला प्रशासन न केवल कानून-व्यवस्था संभालता है, बल्कि बराबर पहाड़ियों को 'विश्व धरोहर' की सूची में शामिल कराने और 'सोइया घाट' व 'बुढ़वा महादेव' जैसे धार्मिक स्थलों को पर्यटन सर्किट से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयासरत है। जहानाबाद जिला के विकास में जिला पदाधिकारियों में शक्ति कुमार नेगी भा प्र से , संजय कुमार अग्रवाल भा प्र से , बाला मुरागन डी , पलका साहिनी भा प्र से आदि का। योगदान महत्वपूर्ण रहा है ।
अतीत के गौरव के साथ भविष्य की ओर अग्रसर जहानाबाद का जहान नगर से जहानाबाद और जाह्नू साम्राज्य से आधुनिक प्रशासनिक जिला बनने तक की यह 2000 से अधिक वर्षों की गाथा इस बात का प्रमाण है कि यह भूमि कभी थमी नहीं। यहाँ की मिट्टी में जरासंध का पराक्रम है, तो जाह्नू ऋषि का विवेक; सम्राट अशोक की धार्मिक सहिष्णुता है, तो शहजादी जहांआरा का विजन; सूफी संतों का सूफियाना कलाम है, तो बुढ़वा महादेव और ठाकुरबाड़ियों का सनातनी शंखनाद।
दरधा और जमुनी नदियों के संगम पर बहने वाली ठंडी हवाएं आज भी सोइया घाट के भूगर्भ जल की तरह ही पवित्र और ऊर्जावान हैं। आज का जहानाबाद अपने ऐतिहासिक गौरव को सीने से लगाए, अपनी पंच-धार्मिक सांस्कृतिक विरासत को सहेजे, जिला प्रशासन के सहयोग से शिक्षा, उद्योग और पर्यटन के नए क्षितिज छूने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह मगध का वह कोहिनूर है, जिसकी चमक कल भी थी, आज भी है और आने वाले भविष्य में भी रहेगी।
करपी , अरवल , बिहार 804419
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