वो यादें और पल
संजय जैनयाद है वो पल आज भी
जब हम तुम मिले थे।
लाख गिले शिकवे थे
पर दिल हमारे मिले थे।।
रोज लड़ते झगड़ते थे
फिर पुन: गले मिलते थे।
छोटी बड़ी सभी बातों को
हम आपस में बाँटते थे।।
अब ये कहाँ देखने और
कहने सुनने को मिलते है।
अब तो छोटी-छोटी बातों पर
बड़े-बड़े झगड़े कर लेते है।।
न ही रिश्तें और न रिश्तेंदार
अब हमारे और तुम्हारे बचें है।
जो रिश्तों की परिभाषा और
उनके महत्व को समझते है।।
स्वार्थ में इतने फस चुके है
बिना स्वार्थ के देखते नही है।
छोटी-छोटी खुशियाँ हमारी
स्वार्थ की भेंट चढ़ गई है।।
आज अकेले बैठ कर
उन पलों को सोच रहे है।
अपने जीवन का हम
मूल्यांकन कर रहे है।।
पल भर की खुशियाँ भी
बाँटने वाला कोई नही है।
समय अनुसार चलने की
लोगों की आदत बन गई है।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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