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सदियों से करते रहे, हम ऐसे छलछंद।।

सदियों से करते रहे, हम ऐसे छलछंद।।

जयराम जय

ट्रस्ट बनाया आपने, करके सोच विचार।
ट्रस्टी सब करते रहे,माल ट्रस्ट का पार।।

रघुनंदन के दान का,रक्खे कौन हिसाब।
हमको यह अधिकार है,तुम सब देखो ख्वाब।।

इस मुद्दे आप क्यों, बजा रहे हो गाल।
हम शासक हैं जानते,कहां रखा है माल।।

दान दक्षिणा जो दिया,उसको जाओ भूल।
दान दक्षिणा के नियम,करिये सभी कबूल।।

दान पात्र के हैं यहां,असल लुटेरे कौन।
सच बतलाएं आपको,जो धारे हैं मौंन।।

खेला कर चंपत गुरू,चेला पहुंचे जेल।
चोरों के सरदार का,देख रहे हो खेल।।

नियम कायदे ताख पर,कुछ लोगों के हेतु ।
अपनों के खातिर यहां,ढहे नियम के सेतु।।

रघुनंदन के दाम पर,किसका है अधिकार।
जो वर्षों से कर रहे, रघुनंदन से प्यार।।

होकर के फिर क्यों मुखर,करने लगे विरोध।
धन्धा मंदा मत करो, वर्ना झेलो क्रोध।।

परेशान हो किस लिए,मुंह रक्खों तुम बंद।
सदियों से करते रहे, हम ऐसे छलछंद।।

हम लाए थे राम को, कहें मूंछ दे ताव।।
जब से मन मन्दिर बसा,झेले नहीं अभाव।।

धीरे-धीरे खुल रही, है चोरों की पोल।
चट्टों-बट्टों के लिए,द्वार दिए सब खोल ।।

ऊपर से नीचे सदा, बढ़ता भृष्टाचार।
बच जाते हैं सरगना,फस जाते लाचार।।

चपत लगा चंपत हुए,चाचा चंपत लाल।
साथ उन्हें भी ले गए,जो थे प्रमुख दलाल।।

चुरा लिया चंदा कभी,कभी चुराया दान।
वे भक्तों के सामने,बनते बड़े महान।।

हम भी साझीदार कुछ,तुम भी साझीदार।
वर्ना कैसे चल रहा,झूठे का व्यापार।।

लिए सहारा झूठ का,खेल रहे हैं खेल।
घड़ा पाप का भर गया, तब निश्चित है जेल।।

यहां गजनवी हैं अभी,बाबर हैं श्रीमान।
लूट मचाए हैं वही,किधर आपका ध्यान।।

कहते जिम्मेदार हैं,जांच पे है संतोष।
दान वीर विस्मित हुए,है भक्तों में रोश।।

घपला कई करोड़ का,जेल गए हैं आठ।
जो आरोपी हैं असल,उन मुखियों के ठाठ।।

काम आएंगे यही सब,अभी नहीं है ताव।
इन्हें बचाकर के रखा,आने देव चुनाव।।
*~ जयराम जय
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