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बदला समाज

बदला समाज

जय प्रकाश कुवंर
अब बचा नहीं कोई जगह,
जहाँ अत्याचार नही है।
अब बचा नहीं कोई जगह,
जहाँ भ्रष्टाचार नहीं है।।
जिन लोगों के पास काम नहीं,
उन्हें नौकरी की दुहाई है।
जब नौकरी मिल गयी तो,
रोज ढेरों उपरी कमाई है।।
सीधा सरल आदमी को,
यहाँ मूर्ख समझा जाता है।
बड़बोला और षड्यंत्रकारी मनुष्य,
यहाँ दबंग कहलाता है।।
जो लूट मार करते फिरे,
आज कल उसकी ही चलती है।
इमानदार मनुष्य की,
आज कल दाल नहीं गलती है।
शासक, प्रशासक ,नेता और कानून,
सब भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं।
आम जनता बलि का बकरा है,
सब लोग अब ऊबे हुए हैं।।
ऐसा समाज बहुत दिन,
किसी भी हाल में चल नहीं पाएगा।
इनको आज बहुत अच्छा दिखता है,
एक दिन रसातल को चला जाएगा।।

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