डिजिटल चक्रव्यूह और पंचतत्व का वरदान
सत्येन्द्र कुमार पाठक
मुख्य पात्र - गज्जू (गौरव): 10 वर्ष का नायक, जो अपनी बुद्धिमानी से सबको राह दिखाता है। डुग्गू (10 वर्ष) और अंशिका (10 वर्ष): जुड़वां भाई-बहन, जो चतुर और जिज्ञासु हैं। शशांक (9 वर्ष): थोड़ा लालची और खाने-पीने का शौकीन। पुच्चू (6 वर्ष) और पीहू (5 वर्ष): सबसे छोटे और शरारती बच्चे। दादा जी: 70 वर्ष के, ज्ञान का भंडार और मार्गदर्शक। प्रकृति के दूत (झांकी के पात्र): आम का पेड़, मोर, तोता-मैना और 'स्क्रीन-राक्षस'।।बड़े पात्र: मम्मी, पापा, चाचा, चाची, फूफी, फूफा (जो शादी के माहौल में व्यस्त हैं)।
स्थान - मंच पर एक तरफ दादा जी के पुराने घर का सुंदर आँगन है, जहाँ बुआ की शादी का शाम का समारोह चल रहा है। रोशनी, आम के पेड़, और मेजों पर पारंपरिक पकवान (लड्डू, ठेकुआ, कचौड़ी, शर्बत) सजे हैं। दूसरी तरफ एक काल्पनिक 'डिजिटल दुनिया' (चक्रव्यूह) की नीली रोशनी है।
(पृष्ठभूमि में शहनाई और उत्सव का संगीत बज रहा है। चाचा-चाची और फूफी-फूफा मेहमानों का स्वागत कर रहे हैं। मम्मी-पापा सबको कचौड़ी और शर्बत दे रहे हैं। आँगन के बीच में एक बड़ी मेज पर लड्डू और ठेकुआ सजे हैं। गज्जू, डुग्गू, अंशिका, शशांक, पुच्चू और पीहू एक कोने में बैठे हैं। शशांक चुपके से लड्डू चुराने की कोशिश करता है, जबकि पुच्चू और पीहू मोबाइल स्क्रीन में खोए हैं।)
गज्जू: (शशांक का हाथ पकड़कर) अरे शशांक! पहले ही चार लड्डू खा चुके हो। जरा सब्र करो, मेहमानों को तो मिल लेने दो।
शशांक: (मुँह बनाकर) गज्जू भैया, इस डिजिटल ज़माने में जो पहले झपट्टा मारे, लड्डू उसी का होता है!
अंशिका: (चिढ़कर) तुम बस खाने की सोचना। यहाँ देखो, पुच्चू और पीहू को। बुआ की शादी का इतना बड़ा उत्सव है, पर ये दोनों इस छोटे से मोबाइल के भूत के वश में हैं।
डुग्गू: (पुच्चू से फोन छीनते हुए) पुच्चू, पीहू! चलो बाहर देखो, कितना सुंदर मौसम है। आँगन में मोर नाच रहा है, तोता-मैना चहक रहे हैं।
पुच्चू: (रोने की एक्टिंग करते हुए) नहीं! मेरा फोन वापस करो। मुझे रील्स देखनी हैं
पीहू: हाँ! मुझे भी गेम खेलना है। मुझे नहीं देखना कोई मोर-तोता!
(तभी दादा जी लाठी टेकते हुए आते हैं। उनके चेहरे पर चिंता है।)
दादा जी: बच्चों! आज हमारे घर में इतना शुभ काम है, और तुम सब इस यंत्र के गुलाम बने बैठे हो? याद रखो, जो अपनों के बीच रहकर भी दूर रहे, वह कभी सुखी नहीं रहता। तभी तो हमारे पूर्वज कह गए हैं:
"तेरा मेरा रिश्ता गहरा है, दिल के जज्बात गहरे हैं।
दूर होकर भी तेरे पास हैं, यही तो हमारा अंदाज है।"
पर तुम लोग तो पास होकर भी एक-दूसरे से दूर हो गए हो।
(अचानक बिजली कड़कती है। उत्सव का संगीत बंद हो जाता है और डरावनी नीली रोशनी मंच पर छा जाती है। मेहमान और बड़े पात्र धुंधले पड़ जाते हैं (फ्रीज हो जाते हैं)। मंच के पीछे से 'स्क्रीन-राक्षस' अट्टहास करता हुआ आता है। उसके गले में टूटे हुए कीबोर्ड और चेहरे पर मोबाइल की स्क्रीन का मुखौटा है।)
स्क्रीन-राक्षस: हाहाहा! बिल्कुल सही कहा बूढ़े दादा जी! ये बच्चे अब तुम्हारे नहीं, मेरे गुलाम हैं। मैंने इनके दिमाग में 'डिजिटल चक्रव्यूह' रच दिया है। अब इन्हें न रिश्तों की परवाह है, न प्रकृति की!
डुग्गू और अंशिका: (डरकर गज्जू के पीछे छुपते हुए) यह कौन है? बचाओ!
गज्जू: (साहस दिखाते हुए) तुम जो कोई भी हो, हमारे आँगन से चले जाओ! यह हमारी बुआ की शादी का पवित्र उत्सव है।
स्क्रीन-राक्षस: मैं नहीं जाऊँगा! देखो अपने इन छोटे बच्चों को। (वह पुच्चू और पीहू की तरफ इशारा करता है, जो सम्मोहित होकर स्क्रीन की तरफ बढ़ रहे हैं)। इनकी आँखें कमजोर हो चुकी हैं, इनका दिल स्वार्थी हो चुका है। पुच्चू, क्या तुम अपना लड्डू अंशिका को दोगे?
पुच्चू: (गुस्से में लड्डू छुपाकर) नहीं! यह सिर्फ मेरा है। मैं किसी को नहीं दूँगा।
स्क्रीन-राक्षस: हाहाहा! देखा? इनका दिल काला हो रहा है। और जिसका दिल काला, वह मेरे इस नीले चक्रव्यूह का परमानेंट कैदी!
गज्जू: (दादा जी से) दादा जी, हम इन्हें कैसे बचाएं? मेरा सुपरहीरो ज्ञान यहाँ काम नहीं कर रहा!
दादा जी: (गंभीरता से) गज्जू, इस राक्षस को कोई तलवार नहीं हरा सकती। इसे हराने के लिए तुम्हें प्रकृति के तत्वों और रिश्तों के सच्चे विश्वास को जगाना होगा।
अंक 3: प्रकृति के दूतों का ज्ञान
(अचानक आम के पेड़ से तेज रोशनी निकलती है। मंच पर मोर, तोता और मैना बने बच्चे नाचते हुए आते हैं। स्क्रीन-राक्षस डरकर पीछे हटता है।)
आम का पेड़: (गंभीर आवाज में) हे मानव के बच्चों! तुम उस स्क्रीन में झूठी हरियाली देखते हो, जबकि मैं तुम्हें असली फल और ऑक्सीजन देता हूँ। याद रखो, अहंकार और तकनीक की ऊँचाई तुम्हें अपनों से दूर कर देगी।
"अहंकार इतना ऊँचा मत रखो, कि स्वयं को नीचे देख डर लगे।
इमारत इतनी ऊँची मत बनाओ, कि नीचे देखकर स्वयं डर जाओ।।"
मोर: (पंख फैलाकर) जब मैं नाचता हूँ, तो बारिश की बूंदें धरती को चूमती हैं। वह ख़ुशी तुम्हें किसी वीडियो में नहीं मिलेगी!
तोता और मैना: (एक साथ) जागो बच्चों, जागो! दुनिया में बहुत से लोग मिलेंगे, पर परिवार जैसा हीरा कहीं नहीं मिलेगा। जैसा कि नियम है:
"जिंदगी का तजुर्बा कुछ कहता है, अपने पराये का भेद खोलता है।
बहुत मिलते हैं राह चलते लोग, पर उनमें हीरा एक ही होता है।।"
अंशिका: (रोते हुए) मुझे समझ आ गया! पुच्चू, पीहू... देखो, हमारा परिवार, हमारे दादा जी, हमारे माता-पिता ही हमारे असली हीरे हैं। फोन के दोस्त नकली हैं!
शशांक: (अपने हाथ का लड्डू पुच्चू की तरफ बढ़ाते हुए) पुच्चू, यह लो आधा लड्डू तुम खाओ। मुझे अब अकेले सब कुछ नहीं खाना। मुझे तुम्हारा साथ चाहिए।
अंक 4: विश्वास की जीत और राक्षस का अंत
(जैसे ही बच्चे एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हैं, स्क्रीन-राक्षस तड़पने लगता है।)
स्क्रीन-राक्षस: नहीं! तुम लोग आपस में प्यार नहीं कर सकते! अगर तुम लोग साथ आ गए, तो मेरा वाई-फाई सिग्नल टूट जाएगा! मेरी बैटरी लो हो रही है!
पुच्चू: (अपनी आँखें मटकाते हुए और शर्मिंदा होकर)
"आज झुकी हैं आँखें मेरी तेरे लिए जो,
बहुत नम हैं आँखें क्योंकि उनमें शर्म हया है।।"
दीदी, भैया... मुझे माफ़ कर दो। मेरा दिल काला नहीं है। (वह फोन जमीन पर रख देता है)।
गज्जू: (सभी बच्चों का हाथ पकड़कर एक घेरा बनाता है) दोस्तों, अब समय है इस राक्षस को आखिरी चोट देने का। अपनी दोस्ती और विश्वास की ताकत को दोहराओ!
सभी बच्चे एक साथ (ऊंची आवाज में गाते हैं):
"तेरी मेरी दोस्ती अमर है, तेरा मेरा रिश्ता पक्का है।
चाहकर भी लोग इसे कभी नहीं तोड़ पाये हैं।।
क्योंकि एक दूसरे पर विश्वास हम दोनों का बहुत गहरा है,
जिसे आंधी और तूफान भी कभी नहीं तोड़ पायेंगे।।"
स्क्रीन-राक्षस: (चीखते हुए) नो नेटवर्क! बैटरी डेड! जीरो परसेंट... धड़ाम!
(स्क्रीन-राक्षस मंच पर गिरता है और अंधेरे में गायब हो जाता है। अचानक तेज पीली रोशनी होती है। मम्मी, पापा, चाचा, चाची, फूफा, फूफी सब 'डी-फ्रीज' (होश में) हो जाते हैं और बच्चों को गले लगा लेते हैं।
(आँगन फिर से खुशियों से भर जाता है। फूफी ठेकुआ और कचौड़ी की थाली लाती हैं, चाचा सबको शर्बत देते हैं।)
मम्मी: अरे बच्चों! तुम सब अचानक इतने शांत और समझदार कैसे हो गए? और तुम्हारे फोन कहाँ हैं?
पीहू: (मम्मी के गले लगकर) मम्मी, हमने फोन को हमेशा के लिए 'स्क्रीन-राक्षस' के पास भेज दिया। अब हम सिर्फ संडे को थोड़ी देर पढ़ाई के लिए उसे छुएंगे।
पापा: (गर्व से) वाह! यह तो हमारी बुआ की शादी का सबसे बड़ा उपहार है।
दादा जी: (मंच के आगे आकर दर्शकों से)
"तो दर्शकों और बच्चों, आज का ज्ञान यही है—तकनीक सुविधा के लिए है, जीवन जीने के लिए नहीं। असली शर्बत की मिठास और ठेकुआ का स्वाद अपनों के साथ बैठकर खाने में है। अपने रिश्तों पर विश्वास गहरा रखो, ताकि कोई भी आधुनिक आंधी इसे तोड़ न सके।"
(सभी पात्र एक साथ मंच पर आते हैं। मोर नाचता है और तोता-मैना फूलों की वर्षा करते हैं। सब मिलकर हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं।)
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