समाधि और मृत्यु में अंतर

साधारण दृष्टि में श्वास केवल हवा का आना-जाना है, लेकिन योग और अध्यात्म में श्वास ही 'प्राण' का वाहन है। इस आवागमन के रुकने के दो अलग-अलग अर्थ होते हैं, जो मनुष्य की नियति को पूरी तरह बदल देते हैं।
1. मृत्यु: जब द्वार बंद हो जाए
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जब शरीर की शक्ति क्षीण हो जाती है और श्वास बाहर की ओर प्रवाहित होकर पुनः भीतर की ओर नहीं लौट पाती, तो उसे मृत्यु कहा जाता है।
• यह एक अनिवार्य घटना है, जो प्रकृति के नियम के अधीन है।
• यहाँ जीव विवश है; शरीर थक चुका है और प्राण अब इस पुराने घर को छोड़कर बाहर निकल गए हैं।
• यह 'छूट जाना' है, जहाँ चेतना का भौतिक शरीर से संबंध विच्छेद हो जाता है।
2. समाधि: जब गति विश्राम बन जाए
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इसके विपरीत, जब वही श्वास बाहर जाने के बजाय भीतर ही ठहर जाए, अपने केंद्र पर पूर्णतः विश्राम पा ले, तो वह समाधि है।
• यह विवशता नहीं, बल्कि स्वैच्छिक और सजग अवस्था है।
• समाधि में श्वास का रुकना मृत्यु नहीं, बल्कि 'कुम्भक' की वह पराकाष्ठा है जहाँ मन पूरी तरह शांत हो जाता है।
• यहाँ प्राण बाहर नहीं भटकते, बल्कि आत्मा के महासागर में विलीन हो जाते हैं। इसे ही 'जीवित रहते हुए भी मुक्त हो जाना' कहते हैं।
स्थिति श्वास की दिशा अवस्था परिणाम
मृत्यु बाहर की ओर (बहिर्मुखी) विवशता और अंत पुनर्जन्म का चक्र और आवागमन
समाधि भीतर की ओर (अंतर्मुखी) परम शांति और ठहराव
एवं समस्त चक्रों से सदा सदा हेतु मुक्ति
सार: मृत्यु शरीर का अंत है, जबकि समाधि अहंकार का अंत है। मृत्यु में हम 'छीन' लिए जाते हैं, लेकिन समाधि में हम 'स्वयं को पा' लेते हैं। जब श्वास बाहर निकलकर न लौटे तो शरीर शांत होता है, लेकिन जब श्वास भीतर ही ठहर जाए तो संसार शांत हो जाता है।
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