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अंतर्मन के मंदिर में, प्रिय बस तुम्हारा नाम

अंतर्मन के मंदिर में, प्रिय बस तुम्हारा नाम

कुमार महेंद्र
तुमने छूकर इस मरुथल को,
सावन बन संवार दिया।
मेरे सूने जीवन-पथ को,
प्रीति-भरा उपहार दिया।
धड़कन की वीणा के स्वर में,
गूँजे मधुर प्रणय का गान।
अंतर्मन के मंदिर में, प्रिय बस तुम्हारा नाम।।

जैसे चंदा की किरणों से,
झरती शीतल उजली धार।
वैसे ही तुम आकर बन गए,
मेरे जीवन का आधार।
तुम ही मेरी आराधना हो,
तुम ही मेरा प्रेम-धाम।
अंतर्मन के मंदिर में, प्रिय बस तुम्हारा नाम।।

नयनों के निर्मल दर्पण में,
रूप तुम्हारा खिलता है।
साँसों की मृदु सरगम पर,
गीत तुम्हारा बजता है।
मन के हर एक कोने में,
गूँजे तेरा ही गुणगान।
अंतर्मन के मंदिर में, प्रिय बस तुम्हारा नाम।।

तुमसे ही अस्तित्व मेरा,
तुमसे मेरी पहचान।
तुमसे ही हर स्वप्न सुहाना,
तुमसे जीवन की तान।
तपती धूप भरे पथ पर तुम,
शीतल पीपल की छाँव।
अंतर्मन के मंदिर में, प्रिय बस तुम्हारा नाम।।

अक्षर-अक्षर तुम्हें समर्पित,
भाव-भाव अर्पित हैं।
मेरे मन के सारे मौसम,
तेरे रंगों से सुस्मित हैं।
जन्म-जन्म की साध यही हो,
बनकर रहूँ तेरी मुस्कान।
अंतर्मन के मंदिर में, प्रिय बस तुम्हारा नाम।।

कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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