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हाथ न फैलाऊँ

हाथ न फैलाऊँ

संजय जैन

मन की बातें अपनी कहकर
खुदको हल्का कर लिया।
जीवन पथ पर चलकर के
मोक्ष मार्ग को खोज लिया।।

मानव जीवन मिलता है
पूर्व जन्मों के कर्मो से।
जो कुछ तूने पाया है
अपने कर्मो के बल पे।।

कभी नही तू भटकना
कर्तव्यों वाले पथ से।
जिस पर चलकर ही तू
निर्वाह करेगा दायित्वों का।।

आज दुख है तू तो
कल खुशी भी आयेगा।
संसारिक इस चक्र को
हे मानव तू निश्चित भेदेगा।।

बस अपने आत्म बल पर
आड़े रहना निडर होकर।
सब सपने पूरे होंगे तेरे
हाथ प्रभु का थामे रखना।।

रोज प्रार्थना करना तुम
प्रात: उठकर प्रभु से तुम।
हे प्रभु इतना देना मुझको
फैलाऊँ न हाथ कही पर।।

जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई

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