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प्रेम का बीज

प्रेम का बीज

जय प्रकाश कुवंर
जब किसी का दिल,
किसी पर आ जाता है।
एक दूजे को देखकर,
चेहरे का भाव बदल जाता है।।
बातें करना , हाव भाव,
कुछ अलग नजर आता है।
बाल संवारना, तन को सजाना,
सब सिलसिला बदल जाता है।।
आंखें कभी मिलती हैं ,
कभी नीची हो जाती हैं।
अधरों की मुस्कराहट में,
एक अजीब खुशी छा जाती हैं।।
किसी ओट से निहारने में,
खुब मजा आता है।
बातें नहीं भी हो कोई बात नहीं,
निहार कर दिल गदगद हो जाता है।।
लाख छुपाने की कोशिश करो पर,
इश्क़ और प्रेम नहीं छुपता है।
मिलन का संयोग न बने तो भी,
दिल अंदर से कभी नहीं रूठता है।।
युगों युगों से प्रेम,
ऐसे ही होता आया है।
यह ऐसी अग्नि है,
जिससे मनुष्य, देव, दानव,
कोई नहीं बच पाया है।।

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