मित्रता
हम उनको न समझ सकेवो हमको न समझ पाये।
पर हम फिर भी निरंतर
मिलते जुलते रहे।
एक दूसरे से अपने
दुख दर्द बाटते रहे।
जिससे लोगों ने इसे
अलग ही रंग दे दिया।।
हमारी मित्रता का उन्होंने
अलग ही नाम दे दिया।
अब करे तो क्या करे हम
इस हवा को रोकने के लिए।
जो दिखता है जमाने को
वो सच भी तो नहीं होता।
और हालातों के शिकार
हम जैसे हो जाते है।।
माना की मोहब्बत का
रंग चढ़ते देर नहीं लगती।
निगाहों से निगाहों का
मिलन भी जल्दी होता है।
दिलों की चाहत भी तो
जल्दी बढ़ने लगती है।
और मोहब्बत का भूत
दिल पर छा जाता है।।
समय के साथ-साथ फिर
सब कुछ बदलने लगता है।
समझने और जानने की
समझ फिर कहा रहती है।
दिलों में फिर प्यार का
रंग ही रंग दिखता है।
जो हमारी मित्रता का
स्वरूप ही बदल देता है।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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