मेघ , बादल , घन
अरुण दिव्यांशचहुॅंओर है घन घना ,
भानू का प्रकाश मना ,
चहुॅंओर बिजली कड़क ,
दिवा भी उदास बना ।
विजयी हो जैसे बादल ,
निशा का एहसास बना ,
या तो भानू हुआ बंदी ,
या भानू है दास बना ।
या रवि थका चलकर ,
तन में भारी ह्रास बना ,
या दिवा बदले निशा में ,
भानू स्वयं उपहास बना ।
घन को जैसे चढ़े नशा ,
दिवा को बदलूॅं निशा में ,
बिजली हुआ उसका संगी ,
कुछ तो मिले हिस्सा में ।
किंतु भानू बना महाबली ,
माना कभी वह हार नहीं ,
आता रहा भानू का तेज ,
दासता जैसे स्वीकार नहीं ।
मेघ गर्जन का असर नहीं ,
बिजली चमक उदास बना ,
कुछ ही पल में छॅंटा घन ,
भानू पुनः अब खास बना ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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