परियारी पंचायत की विरासत
सत्येन्द्र कुमार पाठक
बिहार के अरवल जिले के करपी प्रखंड के अंतर्गत आने वाली परियारी ग्राम पंचायत अपने आप में गौरवशाली वैदिक इतिहास, अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत, जटिल सामाजिक पृष्ठभूमि और आधुनिक जन-आकांशाओं की एक अनूठी दास्तान समेटे हुए है। मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर यह क्षेत्र आज भी अपनी प्राचीन विरासत की गौरवगाथा गाते हुए आधुनिकता और समावेशी विकास की नई राह तलाश रहा है।
'परियों के स्थल' से 'परियारी' तक - परियारी का इतिहास केवल कुछ सदियों पुराना नहीं, बल्कि इसका संबंध प्रागैतिहासिक और वैदिक कालीन भारत से है। लोक-सांस्कृतिक मान्यताओं और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार इस क्षेत्र के नामकरण और अस्तित्व के पीछे एक बेहद दिलचस्प इतिहास छिपा है:।हिरण्यबाहु नदी का ऐतिहासिक अवशेष: प्राचीन ग्रंथों में वर्णित और यूनानी राजदूत मेगास्थनीज द्वारा अपनी पुस्तक 'इंडिका' में इराओबोआस नाम से संबोधित की गई विलुप्त वैदिक नदी 'हिरण्यबाहु' (आधुनिक सोन नदी की प्राचीन विधा) का अवशेष आज भी इस क्षेत्र में 'परियारी चकला' के नाम से जाना जाता है। भौगोलिक परिवर्तनों के कारण नदी की मुख्य धारा तो दूर चली गई, लेकिन यह चकला आज भी उस प्राचीन जलस्रोत की गवाही देता है। प्राचीन काल में यह पूरा भू-भाग 'हिरण्य प्रदेश' का एक हिस्सा था, जो अपने घने जंगलों, औषधीय वनस्पतियों और प्राकृतिक छटा के कारण तंत्र-मंत्र, यक्ष साधना और अलौकिक शक्तियों का मुख्य केंद्र माना जाता था। शास्त्रों में जिन्हें 'अप्सरा' या 'योगिनी' कहा गया, लोकभाषा में उन्हें 'परी' के रूप में जाना गया। मान्यता है कि यह इन दिव्य शक्तियों का साधना स्थल था। समय चक्र के साथ यह स्थान पहले 'परी-स्थल' कहलाया, फिर परियों के मित्र स्थल के रूप में 'परी-यार' बना, जो आगे चलकर 'परी-यारी' और कालांतर में अपभ्रंश होकर 'परियारी' के नाम से विख्यात हुआ।
परियारी पंचायत भौगोलिक रूप से एक मैदानी और ग्रामीण क्षेत्र है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 3.22 वर्ग किलोमीटर (अर्थात लगभग 820 एकड़) में फैला हुआ है। यहाँ की उपजाऊ मिट्टी कृषि के लिए अत्यंत उपयुक्त है। वर्ष 2011 की आधिकारिक जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, इस पंचायत की जनसांख्यिकी स्थिति और सामाजिक संरचना निम्नलिखित तालिका के माध्यम से स्पष्ट रूप से समझी जा सकती है:।कुल आबादी 8,329 , पुरुष जनसंख्या 4,233 , महिला जनसंख्या 4,096 है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि पंचायत में जनसंख्या का घनत्व संतुलित है और यहाँ एक बड़ा कार्यशील समाज निवास करता है।
परियारी पंचायत के अंतर्गत दो मुख्य राजस्व गाँव आते हैं—'परियारी' और 'परियारी बिगहा'। इसके अतिरिक्त, इस पंचायत की परिधि में कई छोटे-छोटे पारंपरिक टोले और ऐतिहासिक बसावटें शामिल हैं, जहाँ सामान्य ग्रामीण किसान, श्रमिक और महादलित समुदाय के लोग एक साथ मिलकर निवास करते है।
परियारी डीह: पंचायत का मुख्य प्राचीन केंद्र, जो ऊंचे टीले (डीह) पर बसा है।।परियारी बाजार: व्यापार और विनिमय का स्थानीय केंद्र, जिसे अब आधुनिक नाम 'शांतिपुरम' दिया गया है। गनियारी, कंसारा, झुनाथी, हाजीपुर, निरखपुर, महारिया , विलारबन बिगहा, महमदपुरा, महिदपुर, मर्दन बिगहा और मीरजापुर क्षेत्र को एक बहुरंगी सामाजिक स्वरूप प्रदान करती है, जहाँ हर टोले की अपनी एक विशिष्ट पहचान है।
परियारी की भूमि प्राचीन मगध साम्राज्य के उस केंद्रीय भू-भाग का हिस्सा रही है, जहाँ भारत की लगभग सभी प्रमुख धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक विचारधाराओं का गहरा मंथन हुआ। यहाँ विभिन्न युगों के प्रभाव को इस प्रकार देखा जा सकता है: नंद और मौर्य काल: वैदिक पृष्ठभूमि और प्रकृति पूजा में महान नंद साम्राज्य और मौर्य वंश के समय यह क्षेत्र मगध की राजधानी पाटलिपुत्र के दक्षिण-पश्चिमी द्वार की तरह काम करता था। पास में स्थित मौर्यकालीन 'बराबर की गुफाएँ' इस बात का प्रमाण हैं कि इस पूरे क्षेत्र में बौद्ध भिक्षुओं और जैन श्रमणों का गहरा प्रभाव था। इस काल में यहाँ यक्ष संस्कृति और प्रकृति पूजा के रूप में 'सौर' (सूर्य उपासना) की परंपरा सुदृढ़ हुई, जो आज भी बिहार के महापर्व छठ के रूप में यहाँ जीवंत है।।गुप्त काल: शैव, वैष्णव और ब्रह्म संस्कृति का समन्वय में गुप्त राजाओं के शासनकाल को सनातन धर्म का 'पुनर्जागरण काल' माना जाता है। इसी दौर में परियारी क्षेत्र में शैव (भगवान शिव) और वैष्णव (भगवान विष्णु/राम) मतों के बीच अद्भुत समन्वय स्थापित हुआ। इसका सबसे बड़ा प्रमाण परियारी डीह में स्थित ऐतिहासिक राम जानकी लक्ष्मण ठाकुरबाड़ी और उसके समानांतर बने प्राचीन शिव मंदिर हैं। पाल और सेन काल: तंत्र-मंत्र और शाक्त परंपरा में 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच पाल राजाओं के दौर में मगध में बौद्ध धर्म की 'वज्रयान' शाखा का प्रभाव बढ़ा। इस काल में परियारी चकला अपनी भौगोलिक स्थिति (सोन-पुनपुन दोआब) के कारण शाक्त (शक्ति पूजा) और गुप्त तांत्रिक साधना का एक सिद्ध उप-केंद्र बनकर उभरा। सेन काल के आगमन के साथ यहाँ पुनः पौराणिक वैदिक कर्मकांडों को बल मिला।।मुगल काल: सूफी मत और लोक देवों का सुदृढ़ीकरण - मुगल काल (विशेषकर शेरशाह सूरी के समय) में अरवल का यह क्षेत्र हस्तनिर्मित कागज (कागजी कला) के लिए प्रसिद्ध हुआ। इस दौर में जहाँ एक ओर सूफी संतों के आगमन से सांस्कृतिक ताने-बाने में नया आयाम जुड़ा, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण अंचलों में बाहरी आक्रांताओं और असुरक्षा की भावना के बीच लोक देवताओं (जैसे दहापर का प्रसिद्ध गौरैया स्थान, डीहवार और सती स्थानों) की पूजा की परंपरा अत्यधिक सुदृढ़ हुई।
ब्रिटिश काल: राष्ट्रीय चेतना, खादी और विनोबा आश्रम - अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जब देश में स्वतंत्रता संग्राम की मशाल जली, तो परियारी भी उससे अछूता नहीं रहा। महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन और स्वामी सहजानंद सरस्वती के किसान आंदोलनों का यहाँ के लोगों पर गहरा असर पड़ा। इसी वैचारिक चेतना के कारण परियारी बाजार में खादी ग्रामोद्योग और भूदान आंदोलन के प्रणेता आचार्य विनोबा भावे के विचारों से प्रेरित 'विनोबा आश्रम' की स्थापना हुई, जिसने ऋषि संस्कृति के आधुनिक रूप—'मानव सेवा और स्वावलंबन' को धरातल पर उतारे थे ।
मगध का यह संपूर्ण क्षेत्र आदि काल से ही सनातन धर्म में ऋषि संस्कृति और पितृ तर्पण के लिए वैश्विक स्तर पर विख्यात रहा है। परियारी का आध्यात्मिक जुड़ाव भी इसी दर्शन से है: ऋषियों का निवास: इस क्षेत्र को महर्षि कपिल (कपिल मुनि) की तपोभूमि माना जाता है, जिनके नाम पर ही 'करपी' प्रखंड का नामकरण (कपिल से कड़पी और फिर करपी) हुआ। इसके अलावा भृगुवंशी ऋषियों की साधना भी इस नदी क्षेत्र में रही है। परियारी के पास से बहने वाली पुनपुन नदी को शास्त्रों में 'आदि गंगा' और 'प्रथम तर्पण स्थल' माना गया है। मान्यता है कि गया श्राद्ध से पूर्व पुनपुन के तट पर पितरों का आह्वान किया जाता है। परियारी के ऋषियों ने प्राचीन काल में यहाँ पितृ-कर्म और ब्रह्म विद्या के विशेष अनुष्ठान शुरू किए थे, ताकि अकाल मृत्यु को प्राप्त आत्माओं को प्रेत योनि से मुक्ति मिलकर मोक्ष प्राप्त हो सके। इसी कारण परियारी डीह पर आज भी अपने पूर्वजों और डीहवार बाबा को पूजने की गहरी परंपरा है । कंसारा नरसंहार परियारी पंचायत का अतीत केवल सांस्कृतिक गौरव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने बिहार के उस दौर के भीषण सामाजिक और वर्ग-संघर्ष को भी झेला है, जब मध्य बिहार जातीय और नक्सली हिंसा की आग में झुलस रहा था। 08 जुलाई 1986 को भूमि विवाद, सामाजिक विषमता और वर्चस्व की लड़ाई के चलते तत्कालीन गया (और बाद में जहानाबाद/अरवल) जिले के अंतर्गत आने वाले कंसारा गाँव में एक भीषण और खूनी संघर्ष हुआ। यह टकराव मुख्य रूप से प्रतिबंधित नक्सली संगठन (माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर - MCC) और स्थानीय जमींदारों के बीच था, जिसमें 11 लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। इस जघन्य हत्याकांड के बाद आक्रोशित ग्रामीणों और परिजनों ने मारे गए लोगों के शवों को विरोध स्वरूप परियारी बाजार जहानाबाद-अरवल मुख्य पथ पर रखकर लंबा चक्का जाम किया था। उस समय पूरा परियारी और आस-पास का क्षेत्र इस सामाजिक त्रासदी का मूक गवाह बना था। इस नरसंहार और इसके तुरंत बाद हुए अरवल गोलीकांड ने तत्कालीन बिहार की राजनीति और सत्ता को हिलाकर रख दिया था। कानून-व्यवस्था को नियंत्रित करने, उग्रवाद पर लगाम लगाने और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को सीधे पहुँचाने के उद्देश्य से सरकार को विवश होना पड़ा और 1986 में ही जहानाबाद को एक पूर्ण जिले का दर्जा दिया गया (जिससे आगे चलकर वर्ष 2001 में अरवल जिला अलग बना ।
परियारी पंचायत मूलतः एक कृषि प्रधान क्षेत्र है, जहाँ की अधिकांश आबादी अपनी आजीविका के लिए सीधे तौर पर खेती और पशुपालन पर निर्भर है। लेकिन वर्तमान समय में यहाँ के किसानों के सामने कई गंभीर प्रशासनिक और प्राकृतिक चुनौतियाँ हैं: यहाँ की सिंचाई का मूल और ऐतिहासिक स्रोत 'परियारी चकला' (हिरण्यबाहु नदी का मृत अवशेष) रहा है। यह जलस्रोत कभी पूरे क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी था।
सरकारी स्तर पर आधुनिक नहरों या नलकूपों की पुख्ता व्यवस्था न होने के कारण आज यहाँ के किसानों को खेती के लिए महँगे डीजल और पंपिंग सेटों पर निर्भर रहना पड़ता है। पटवन की समुचित सुविधा का अभाव, समय पर बिजली न मिलना और भूजल स्तर का खिसकना यहाँ की मुख्य आर्थिक समस्याएं हैं, जिससे किसानों की लागत बढ़ जाती है और मुनाफा कम हो जाता है । तमाम अभावों, ऐतिहासिक संघर्षों और संसाधनों की कमी के बावजूद, परियारी पंचायत की नई पीढ़ी अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत के दम पर सफलता की एक नई इबारत लिख रही है। परियारी पंचायत का यह विस्तृत आलेख यह स्पष्ट करता है कि यह भूमि केवल भौगोलिक टुकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और संस्कृति के कई उतार-चढ़ावों की जीवंत गवाह है। जहाँ एक तरफ इसके पास हिरण्यबाहु नदी, ऋषि च्यवन, कपिल मुनि और परियों की पौराणिक विरासत है, वहीं दूसरी तरफ इसने 80 के दशक के संघर्षों को भी देखा है। आज परियारी बाजार का आधुनिक नाम ' जहानाबाद जिला का प्रथम जिलपदाधिकारी हम चंद सिरोही भा प्र से द्वारा 986 ई में शांतिपुरम' रखा जाना इस बात का सूचक है कि यह क्षेत्र अपने हिंसक अतीत को पीछे छोड़कर शांति, सह-अस्तित्व और प्रगति की राह पर आगे बढ़ चुका है। भारती जैसी बेटियों की सफलता यह साबित करती है कि यहाँ की मिट्टी में आज भी देश को बदलने का जज्बा है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि स्थानीय अरवल जिला प्रशासन यहाँ सिंचाई की आधुनिक व्यवस्था करे, खादी ग्रामोद्योग और विनोबा आश्रम जैसी ऐतिहासिक संस्थाओं का जीर्णोद्धार करे और युवाओं के लिए तकनीकी शिक्षा के द्वार खोले, ताकि परियारी पंचायत बिहार के मानचित्र पर एक आदर्श पंचायत के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है।
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