प्रकृति की धरोहर
संजय जैनचाँद सितारे फूल पत्ती
तना डालियों और फलों का।
अदभूत संगम जहाँ पर होता
वो स्थान जन्नत सा दिखता।।
हवा पानी जहाँ पर बहती
वहाँ शीतलता हरियाली रहती।
नम हवाओं का पानी से
बहुत गहरा नाता जो रहता।।
प्रकृति के है खेल निराले
जिसको क्या समझेगा प्राणी।
क्षति गृहस्थ करके प्रकृति को
करता बस सुंदरता को नष्ट।।
हरि भरी इस धरती को
क्यों करते रहते है नष्ट।
अपने स्वार्थ के चक्कर में
सौंदर्यता को किया है नष्ट।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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