बरसात
अरुण दिव्यांशआ गईल अब बरसात ,
गरमी के दिहले मात ।
दिन जईसे तईसे बीते ,
मुश्किल काटल रात ।।
गरमी तनी उसीनत रहे ,
ई खउलावे डभकावेला ।
रातभर हाथे पंखा हाॅंक ,
देह पसेना सूखावेला ।।
तबहूॅं देह में चैन नाहीं ,
कच्छ मच्छ रात कटेला ।
बुझाए देह आग लागल ,
जब देह में केहू सटेला ।।
एक भगवान डभकावस ,
दूजे कट जाला लाईन ।
एक लागे अंहरिया घुप्प ,
रतियो लागेला डाईन ।।
ना जिए दी ना मरे दीही ,
जिनगी के हूकहूकाई ।
जईसे बिरह मन डहके ,
हिरदा के कुहकावेला ।।
लाईन केकर दोष दीहीं ,
सरकार या विभाग के ।
बुताईं त कईसे बुताईं ,
देहिया लागल आग के ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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