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इंसान में साक्षात भगवान

इंसान में साक्षात भगवान

अरुण दिव्यांश
इंसान में साक्षात भगवान ,
स्वयं में तू देख झाॅंककर ।
क्या तेरे दिल भी भगवान ,
देख स्वयं को ऑंककर ।।
नर के दिल में नारायण हैं ,
इंसान के दिल में भगवान ।
दिल ही नहीं जिनके तन ,
वही तो हो जाते हैं हैवान ।।
नर और नारायण रिश्ता ,
इंसान और भगवान नेक ।
नर और इंसा एक हैं जैसे ,
नारायण भगवान भी एक ।।
जिसके दिल बसे भगवान ,
उसीको मिलता ये ज्ञान है ।
वही होते जन जन प्यारा ,
वही तो बन पाता महान है ।।
बिन भगवान इंसान कहाॅं ,
बिन इंसान ज्ञान कहाॅं है ?
बिन ज्ञान स्थान कहाॅं पे ,
बिन स्थान सम्मान कहाॅं है ?
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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