तेरे चेहरे पर लिखी, मेरे प्रणय की रेखा
कुमार महेन्द्रसहज कमल से नयन तुम्हारे,
ज्यों नव प्रभात सवेरा।
इनमें विहँस रहा है प्रियतम,
मेरे जीवन का डेरा।
मौन अधर पर खिलती जैसे,
मधु-मुस्कान सुलेखा।
तेरे चेहरे पर लिखी, मेरे प्रणय की रेखा।।
अंतर्मन की गहन गुहा में,
तुम स्पंदन बन जाओ।
ज्यों पावन तुलसी उपवन में,
नेह-समर्पण बरसाओ।
स्नेह-सिंधु की तरल तरंगें,
छू जाएँ मन की सुरेखा।
तेरे चेहरे पर लिखी, मेरे प्रणय की रेखा।।
साँसों के कल्पतरु पर तुम,
सुरभित मधु-बेला हो।
तुमसे ही पावन बन पाया,
जीवन का यह मेला हो।
साकार हो उठा आज वह,
स्वप्न कभी जो देखा।
तेरे चेहरे पर लिखी, मेरे प्रणय की रेखा।।
युग-युग का यह नेह-बन्धन,
जन्मों का अटूट अनुबंध।
तुम ही मेरी प्रथम चेतना,
तुम ही प्राणों का संबंध।
हृदय-पटल पर अंकित तुमसे,
प्रीत-रंग की मोहक लेखा।
तेरे चेहरे पर लिखी, मेरे प्रणय की रेखा।।
चन्द्र-किरण सी शीतल तुम,
मन-आँगन की ज्योति।
तुमसे ही मधुमय हो उठती,
जीवन-पथ की प्रीति।
भाग्य-लिपि में स्वर्णाक्षर-सी,
तुम्हारी छवि परम विशेषा।
तेरे चेहरे पर लिखी, मेरे प्रणय की रेखा।।
कुमार महेन्द्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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