अच्छे दिन या बढ़ता आर्थिक बोझ?
- 2013 से 2026 तक महंगाई, रोजगार और आम आदमी की क्रय-शक्ति का सच
डॉ. राकेश दत्त मिश्र
भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहां प्रत्येक सरकार अपने कार्यकाल की उपलब्धियों का लेखा-जोखा जनता के सामने प्रस्तुत करती है। सत्ताधारी दल विकास, जीडीपी वृद्धि, विदेशी निवेश, आधारभूत संरचना और कल्याणकारी योजनाओं को अपनी सफलता का प्रमाण बताते हैं। दूसरी ओर विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं और आम जनता की आर्थिक कठिनाइयों को प्रमुख मुद्दा बनाता है।
किन्तु लोकतंत्र में अंतिम निर्णय आंकड़ों से नहीं, बल्कि जनता के जीवन के अनुभवों से होता है। किसी भी सरकार का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से किया जाता है कि उसके शासनकाल में आम नागरिक का जीवन कितना बेहतर हुआ। उसकी आय बढ़ी या नहीं? उसका खर्च कितना बढ़ा? उसके बच्चों को रोजगार मिला या नहीं? उसकी रसोई सस्ती हुई या महंगी?
2014 में देश की जनता को "अच्छे दिन" का सपना दिखाया गया था। 2026 में बारह वर्षों के शासन के बाद यह स्वाभाविक प्रश्न है कि क्या वास्तव में अच्छे दिन आए हैं या आम आदमी की जेब पर आर्थिक बोझ पहले से अधिक बढ़ गया है?
विकास की चमक और जनता की चिंता
पिछले एक दशक में भारत ने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। आधुनिक एक्सप्रेस-वे बने, वंदे भारत ट्रेनें शुरू हुईं, डिजिटल भुगतान प्रणाली ने दुनिया को प्रभावित किया, हवाई अड्डों का विस्तार हुआ और भारत वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरा।
इन उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता।
लेकिन एक दूसरा भारत भी है-वह भारत जो हर महीने राशन खरीदता है, गैस सिलेंडर भरवाता है, बच्चों की फीस जमा करता है और बिजली का बिल चुकाता है। उस भारत के लिए विकास का अर्थ जीडीपी नहीं बल्कि जीवन-यापन की लागत है।
यदि विकास के बावजूद आम आदमी की बचत कम हो रही हो, तो यह गंभीर चिंतन का विषय है।
रसोई की अर्थव्यवस्था: सबसे बड़ी परीक्षा
देश की आर्थिक स्थिति का सबसे सटीक प्रतिबिंब रसोई में दिखाई देता है।
2013 में जो दूध 35 रुपये प्रति लीटर था, वह आज लगभग 70 रुपये के आसपास पहुंच चुका है। आटा, चावल, दाल, तेल, प्याज और आलू जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में 80 प्रतिशत से लेकर 135 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है।
एक मध्यमवर्गीय परिवार जो 2013 में लगभग 6000 रुपये में महीने भर का राशन खरीद लेता था, उसे आज उसी स्तर की जीवनशैली बनाए रखने के लिए 12,000 से 13,000 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं।
यह केवल सांख्यिकीय वृद्धि नहीं है, बल्कि करोड़ों परिवारों की आर्थिक वास्तविकता है।
आज घर चलाने वाली गृहिणी सबसे अच्छी अर्थशास्त्री बन चुकी है। उसे पता है कि बाजार में वस्तुओं की कीमतें कितनी बढ़ी हैं। उसे किसी सरकारी रिपोर्ट की आवश्यकता नहीं है।
गैस सिलेंडर: अच्छे दिनों का सबसे बड़ा प्रश्न
जब "अच्छे दिन" की चर्चा होती है तो सबसे पहले एलपीजी सिलेंडर का उदाहरण सामने आता है।
2013 में घरेलू गैस सिलेंडर लगभग 400 रुपये में उपलब्ध था। आज कई स्थानों पर इसकी कीमत 900 से 1000 रुपये के बीच पहुंच चुकी है।
उज्ज्वला योजना के अंतर्गत करोड़ों परिवारों को गैस कनेक्शन दिए गए। यह निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक और सराहनीय पहल थी। लेकिन कनेक्शन मिलने और नियमित उपयोग करने में बड़ा अंतर है।
देश के अनेक गरीब परिवार आज भी बढ़ती कीमतों के कारण सिलेंडर रिफिल कराने में कठिनाई महसूस करते हैं। कई सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई है कि गरीब परिवारों का एक वर्ग पुनः लकड़ी और अन्य पारंपरिक ईंधनों की ओर लौटने को मजबूर हुआ है।
इसलिए प्रश्न केवल गैस कनेक्शन का नहीं, बल्कि गैस की वहनीयता (Affordability) का भी है।
पेट्रोल और डीजल: हर वस्तु की कीमत का आधार
डीजल और पेट्रोल केवल वाहन चलाने का माध्यम नहीं हैं।
किसान के खेत से लेकर मंडी तक, मंडी से गोदाम तक और गोदाम से उपभोक्ता तक प्रत्येक वस्तु की कीमत में परिवहन लागत शामिल होती है।
डीजल की कीमतों में पिछले वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसका प्रभाव सीधे खाद्यान्न, सब्जियों, दूध और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ा है।
यही कारण है कि ईंधन महंगा होने का असर केवल वाहन मालिकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज को प्रभावित करता है।
बिजली और घरेलू खर्च का नया संकट
महंगाई की चर्चा में बिजली का मुद्दा अक्सर पीछे छूट जाता है।
2013 में अधिकांश परिवारों का बिजली बिल 500 से 700 रुपये के बीच आता था। आज वही बिल 1500 से 2500 रुपये तक पहुंच चुका है।
इसके साथ-साथ पानी, मोबाइल, इंटरनेट, शिक्षा और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च भी तेजी से बढ़ा है।
परिणामस्वरूप परिवार की कुल मासिक बचत लगातार घटती जा रही है।
रोजगार: सबसे गंभीर चुनौती
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। यह अवसर भी है और चुनौती भी।
हर वर्ष लाखों शिक्षित युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। लेकिन रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़े हैं।
सरकारी नौकरियों में रिक्त पदों की संख्या बड़ी है, जबकि नियुक्तियों की गति अपेक्षाकृत धीमी है। निजी क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध हैं, लेकिन उनमें से बड़ी संख्या अस्थायी, अनुबंध आधारित अथवा कम वेतन वाली है।
आज इंजीनियर, स्नातकोत्तर और तकनीकी डिग्रीधारी युवा भी प्रतियोगी परीक्षाओं और छोटी नौकरियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
यदि किसी राष्ट्र का युवा असुरक्षित महसूस करे, तो विकास का मॉडल अधूरा माना जाएगा।
क्या आय भी बढ़ी है?
यह कहना गलत होगा कि लोगों की आय नहीं बढ़ी।
सातवें वेतन आयोग के बाद सरकारी कर्मचारियों की आय में वृद्धि हुई। निजी क्षेत्र में भी वेतन बढ़े हैं। न्यूनतम मजदूरी भी पहले की तुलना में अधिक है।
लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आय महंगाई से अधिक तेजी से बढ़ी?
यदि किसी व्यक्ति का वेतन 50 प्रतिशत बढ़ा हो और उसका खर्च 100 प्रतिशत बढ़ गया हो, तो उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति कमजोर हुई मानी जाएगी।
इसी को अर्थशास्त्र में क्रय-शक्ति कहा जाता है।
आज भारत की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है।
मुफ्त राशन: उपलब्धि या चेतावनी?
सरकार 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने को अपनी बड़ी उपलब्धि बताती है।
निस्संदेह यह योजना गरीबों को राहत प्रदान करती है और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था का लक्ष्य लोगों को मुफ्त राशन देना नहीं, बल्कि उन्हें इतना सक्षम बनाना होता है कि वे स्वयं अपनी आवश्यकताएं पूरी कर सकें।
यदि देश की 80 करोड़ आबादी को मुफ्त राशन की आवश्यकता है, तो यह सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक असमानता का संकेत भी माना जा सकता है।
राष्ट्र की शक्ति मुफ्त वितरण में नहीं, बल्कि रोजगार और आय सृजन में होती है।
कर व्यवस्था और जनता का बोझ
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कई बार उल्लेखनीय गिरावट आई। लेकिन आम जनता को अपेक्षित राहत नहीं मिली।
इसके पीछे कर संरचना एक महत्वपूर्ण कारण रही है।
ईंधन पर लगाए जाने वाले विभिन्न करों ने खुदरा कीमतों को ऊंचा बनाए रखा। इसका प्रभाव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में जनता पर पड़ा।
जनता का अंतिम निर्णय
लोकतंत्र में जनता किसी आर्थिक सिद्धांत के आधार पर मतदान नहीं करती। वह अपने अनुभवों के आधार पर निर्णय लेती है।
वह देखती है कि उसकी आय बढ़ी या नहीं।
वह देखती है कि बच्चों की शिक्षा का खर्च कितना बढ़ा।
वह देखती है कि गैस सिलेंडर, बिजली, राशन और दवाइयों पर कितना खर्च हो रहा है।
और अंततः वह अपने अनुभवों के आधार पर तय करती है कि सरकार सफल रही या असफल।
आज का भारत निश्चित रूप से 2013 के भारत से अधिक आधुनिक, अधिक डिजिटल और अधिक विकसित अवसंरचना वाला देश है।
लेकिन विकास की अंतिम कसौटी यह नहीं है कि कितने एक्सप्रेस-वे बने, बल्कि यह है कि आम नागरिक का जीवन कितना आसान हुआ।
यदि आय खर्च से अधिक तेजी से बढ़ी है तो अच्छे दिन आए हैं।
यदि खर्च आय से अधिक तेजी से बढ़ा है तो आर्थिक दबाव बढ़ा है।
इसलिए 2013 और 2026 की बहस केवल महंगाई, जीडीपी अथवा राजनीतिक नारों की बहस नहीं है। यह आम आदमी की क्रय-शक्ति, रोजगार, जीवन स्तर और आर्थिक सम्मान की बहस है।
देश का भविष्य केवल विकास परियोजनाओं से नहीं, बल्कि उस किसान, मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी, महिला और युवा की आर्थिक मजबूती से तय होगा जो इस राष्ट्र की वास्तविक शक्ति है।
जनता अंततः उसी सरकार को सफल मानेगी जो उसके जीवन को सरल, सुरक्षित और समृद्ध बनाएगी; क्योंकि अच्छे दिनों का सबसे बड़ा प्रमाण सरकारी विज्ञापन नहीं, बल्कि आम आदमी की मुस्कुराती हुई जेब होती है।
डॉ. राकेश दत्त मिश्र,राष्ट्रीय महासचिव भारतीय जन क्रांति दल (डेमोक्रेटिक)
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