हर परिंदा एक दिन उड़ जाता है…
पर उसके उड़ जाने के बाद
आंगन में रह जाती है यादों की चहचहाहट
और अपनों की एक खामोश तन्हाई।
इन्हीं भावों को समेटती मेरी नई कविता _
पंख निकलते ही परिंदे, छोड़ जाते हैं ठिकाना
कुमार महेंद्रसिखाया था माँ ने जिनको,
घोंसले में दाना चुगना।
नन्हे पंखों को सहलाकर,
धीरे-धीरे उड़ना सीखना।
अब बादलों की ओट में जाकर,
ढूंढ़ रहे हैं नया जमाना।
पंख निकलते ही परिंदे, छोड़ जाते हैं ठिकाना।।
तपती धूप की तपिशों में,
तिनका-तिनका नीड़ सजाया।
आंधी, बारिश, तेज़ हवाओं से,
जिस आशियाने को बचाया।
आज उसी की छांव छोड़कर,
गाते हैं कोई और तराना।
पंख निकलते ही परिंदे, छोड़ जाते हैं ठिकाना।।
आंखों में अनगिन सपने लेकर,
पंखों में नव-अंगड़ाई है।
पर सूने पड़ते आंगन में,
अब भी माँ की तन्हाई है।
रीते पड़े उस नीड़ को अक्सर,
याद आता पुराना चहचहाना।
पंख निकलते ही परिंदे, छोड़ जाते हैं ठिकाना।।
रीत यही संसार की ठहरी,
हर पंखी को उड़ जाना है।
अपनी-अपनी राह बनाकर,
आगे ही बढ़ते जाना है।
पर मत भूलना उस शाख को,
जहाँ सीखा था मुस्काना।
पंख निकलते ही परिंदे, छोड़ जाते हैं ठिकाना।।
जब थक जाओ दुनिया की दौड़ में,
और सपनों का शोर सताए।
तब याद तुम्हें वो आंगन आए,
जो हर दुख में गले लगाए।
माँ-बाबुल का प्रेम ही होता,
जीवन का सच्चा खज़ाना।
पंख निकलते ही परिंदे, छोड़ जाते हैं ठिकाना।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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