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सुरों का वैश्विक उत्सव: 'विश्व संगीत दिवस'

सुरों का वैश्विक उत्सव: 'विश्व संगीत दिवस'

सत्येन्द्र कुमार पाठक
"संगीत वह भाषा है जिसे पूरी मानव जाति बिना किसी अनुवाद के समझ सकती है।"हर साल 21 जून को जब सूरज साल के सबसे लंबे दिन (ग्रीष्मकालीन संक्रांति) के साथ आसमान को रोशन करता है, ठीक उसी समय धरती सुरों, ताल और धुनों की जादुई दुनिया में डूब जाती है। इस दिन को हम 'विश्व संगीत दिवस' वी वर्ल्ड म्यूजिक डे या फ्रांसीसी भाषा में 'फ़ेते डे ला म्यूज़िक' (Fête de la Musique) के रूप में मनाते हैं। यह केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है, बल्कि यह इंसानी जज्बातों, संस्कृति और हर उस आवाज का उत्सव है जो हमारे दिलों को छूती है। विश्व संगीत दिवस की कहानी बेहद दिलचस्प है। इसकी शुरुआत आज से चार दशक पहले कला और संस्कृति की नगरी फ्रांस से हुई थी। परिकल्पना और शुरुआत (1982): साल 1981 में फ्रांस के तत्कालीन संस्कृति मंत्री जैक लैंग और प्रसिद्ध संगीतकार व पत्रकार मौरिस फ्लेरेट ने महसूस किया कि फ्रांस में संगीत को लेकर एक बड़ा जन-आंदोलन होना चाहिए। मौरिस फ्लेरेट का मानना था कि "संगीत हर जगह होना चाहिए और हर किसी के लिए होना चाहिए।" इसी सोच के साथ 21 जून 1982 को पहली बार आधिकारिक तौर पर फ्रांस में 'फ़ेते डे ला म्यूज़िक' मनाया गया।
21 जून को ही क्यों चुना गया? इसके पीछे एक खूबसूरत भौगोलिक और सांस्कृतिक कारण है। 21 जून ग्रीष्मकालीन संक्रांति का दिन होता है, यानी उत्तरी गोलार्ध में साल का सबसे लंबा दिन। इस दिन रात बहुत देर से होती है। फ्रांस के विचारकों ने सोचा कि साल के सबसे लंबे दिन की शाम को क्यों न पूरी तरह से संगीत के नाम कर दिया जाए, जहां लोग देर रात तक सड़कों पर संगीत का आनंद ले सकेंइस उत्सव की सबसे अनूठी बात यह थी कि इसमें दो बुनियादी नियम रखे गए—पहला, सभी संगीत कार्यक्रम मुफ्त (Free) होंगे और दूसरा, इसमें शौकिया (Amateurs) और पेशेवर (Professionals) दोनों तरह के कलाकारों को बिना किसी भेदभाव के अपनी कला दिखाने का मौका मिलेगा। आज फ्रांस की यह अनूठी पहल एक वैश्विक आंदोलन बन चुकी है और दुनिया के 120 से अधिक देशों में इबेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है।
संगीत सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है; यह एक गहरा विज्ञान है। आधुनिक न्यूरोसाइंस ने यह साबित किया है कि संगीत का हमारे मस्तिष्क और शारीरिक स्वास्थ्य पर सीधा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।।जब हम अपनी पसंद का कोई संगीत सुनते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में डोपामाइन (Dopamine) और एंडोर्फिन 'फील-गुड' हार्मोन रिलीज होते हैं। ये हार्मोन तनाव को तुरंत कम करते हैं और मानसिक शांति का अहसास कराते हैं। चिंता और अवसाद से जूझ रहे लोगों के लिए संगीत एक बेहतरीन थेरेपी का काम करता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जो बच्चे बचपन से कोई वाद्य यंत्र बजाना सीखते हैं, उनका आईक्यू और तार्किक क्षमता आम बच्चों से बेहतर होती है। संगीत सुनने और बजाने से मस्तिष्क के दोनों हिस्से एक साथ सक्रिय होते हैं, जिससे एकाग्रता और याददाश्त में सुधार होता है।। धीमा और सुरीला संगीत सुनने से रक्तचाप नियंत्रित रहता है और दिल की धड़कनें संतुलित होती हैं। अनिद्रा की समस्या से परेशान लोगों के लिए सोते समय हल्का संगीत सुनना किसी रामबाण दवा से कम नहीं है। विश्व संगीत दिवस आज पूरी दुनिया को एक सूत्र में पिरोने का काम कर रहा है। अलग-अलग देशों में इसे मनाने के अनूठे रंग देखने को मिलते हैं । फ्रांस पूरे देश में सड़कें, पार्क, कैफे और म्यूजियम स्टेज में बदल जाते हैं। रॉक, जैज़ से लेकर क्लासिकल संगीत गूंजता है। यूनाइटेड किंगडम (UK) इसे 'म्यूजिक डे यूके' (राष्ट्रीय संगीत उत्सव) के रूप में मनाया जाता है, जो ब्रिटिश संगीतकारों को एक बड़ा मंच देता है। संगीत जिंदा है, तब तक इंसानियत और सुकून है।
"नाद रूपः स्मृतो ब्रह्मा नाद रूपो जनार्दनः। नाद रूपा पराशक्तिः नाद रूपो महेश्वरः॥"(अर्थात्: नाद (ध्वनी) ही ब्रह्मा है, नाद ही विष्णु है, नाद ही पराशक्ति है और नाद ही साक्षात् शिव है। पूरा ब्रह्मांड ध्वनि का ही प्रकटीकरण है।) संगीत केवल सात सुरों का उतार-चढ़ाव या मनोरंजन का साधन नहीं है; यह इस ब्रह्मांड की पहली धड़कन है। जब आदिम मानव ने भाषा का आविष्कार भी नहीं किया था, तब भी हवा की सरसराहट, नदियों की कलकल और दिल की धड़कन में एक संगीत मौजूद था। वैश्विक स्तर पर हर साल 21 जून को मनाया जाने वाला 'विश्व संगीत दिवस' (फ़ेते डे ला म्यूज़िक) इसी सार्वभौमिक भाषा का उत्सव है।।लेकिन जब हम संगीत, विशेषकर लोक संगीत की गहराइयों में उतरते हैं, तो हमें इसके दो बेहद मजबूत छोर मिलते हैं—एक छोर भारतीय वांग्मय (साहित्य और दर्शन) की आध्यात्मिक और पौराणिक मान्यताओं से जुड़ता है, तो दूसरा छोर आधुनिक भौतिकी, न्यूरोबायोलॉजी और गणित के वैज्ञानिक सिद्धांतों से। आइए, संगीत की उत्पत्ति, भारतीय वांग्मय में लोक संगीत के अद्वितीय अवदान और इसके वैश्विक वैज्ञानिक पहलुओं पर एक व्यापक और विस्तृत आलेख के माध्यम से विचार करते हैं।
भारतीय वांग्मय में संगीत की उत्पत्ति को लौकिक (भौतिक) नहीं, बल्कि पारलौकिक और दिव्य माना गया है। हमारे ग्रंथों में संगीत के उद्गम को तीन स्तरों पर समझा गया है। भारतीय त्रिमूर्ति और देव-परंपरा संगीत की मूल उत्पत्तिकर्ता मानी जाती है:।शिव का डमरू और तांडव: सृष्टि के संहारक और पुनर्रचयिता भगवान शिव को संगीत का आदि-गुरु माना जाता है। मान्यता है कि उनके तांडव नृत्य और डमरू के 14 बार वादन से 'माहेश्वर सूत्र' की उत्पत्ति हुई, जो संसार की समस्त ध्वनियों, वर्णमाला और व्याकरण का मूल है। शिव का तांडव 'नृत्य' का, माता पार्वती का लास्य 'भाव' का और डमरू 'नाद' का प्रतीक है। ब्रह्मा और देवर्षि नारद: माना जाता है कि सृष्टि के सृजक ब्रह्मा जी ने इस ब्रह्मांड की रचना के साथ ही सामवेद के रूप में संगीत को अवतरित किया। उन्होंने यह विद्या देवर्षि नारद को दी। नारद मुनी ने स्वर्ग के गंधर्वों, किन्नरों और अप्सराओं को संगीत में पारंगत किया, जिन्होंने इसे आगे चलकर धरती पर मनुष्यों तक पहुँचाया। वीणावादिनी सरस्वती: ज्ञान, बुद्धि और कला की अधिष्ठात्री देवी माता सरस्वती के हाथों में स्थित वीणा यह संदेश देती है कि संसार का सारा ज्ञान और चेतना ध्वनि (नाद) के बिना अधूरी है।
सामवेद का संगीत विज्ञान में साहित्यिक और ऐतिहासिक रूप से संगीत का सबसे प्रामाणिक मूल सामवेद है। ऋग्वेद के मंत्रों (ऋचाओं) को जब गेय यानी गाए जाने योग्य छंदों में ढाला गया, तो सामवेद का प्राकट्य हुआ। सामगान की यही पद्धति आगे चलकर भारतीय शास्त्रीय संगीत का आधार बनी। सामवेद में तीन मूल स्वर थे—उदात्त (ऊंचा), अनुदात्त (नीचा) और स्वरित (मध्यम)। इन्हीं तीन वैदिक स्वरों के क्रमिक विकास से संगीत के सात शुद्ध स्वर पैदा हुए: षड्ज (सा), ऋषभ (रे), गांधार (गा), मध्यम (मा), पंचम (पा), धैवत (धा), और निषाद (नि) ।
भारतीय दर्शन के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति से पहले केवल शून्य था, जिसमें एक महाविस्फोट या कंपन हुआ। इस आदि-कंपन को 'अनाहत नाद' (बिना किसी टकराव के पैदा हुई ध्वनि) या 'ॐ' (ओम्) कहा गया। जब यह ध्वनि भौतिक जगत में किसी वस्तु के टकराव से प्रकट होती है, तो इसे 'आहत नाद' कहते हैं। संगीत इसी आहत नाद को एक सुंदर, सुरीले और व्यवस्थित गणितीय क्रम में सजाने की कला है। जहाँ शास्त्रीय संगीत (Classical Music) महलों, दरबारों और आश्रमों में कड़े नियमों, व्याकरण और कठोर अनुशासन के बीच फला-फूला; वहीं लोक संगीत (Folk Music) खुले आसमान के नीचे, खेतों की पगडंडियों पर और आम आदमी के सुख-दुख के बीच स्वाभाविक रूप से जनमा। भारतीय वांग्मय और संस्कृति को समृद्ध करने में लोक संगीत का अवदान अतुलनीय है।
भरत मुनि द्वारा रचित 'नाट्यशास्त्र' (जिसे पंचम वेद भी कहा जाता है) और सारंगदेव के 'संगीत रत्नाकर' जैसे महान ग्रंथों में संगीत को दो भागों में बांटा गया है: मार्गी संगीत: जो मोक्ष की प्राप्ति के लिए नियमों से बंधा हो (शास्त्रीय)। देसी संगीत: जो अलग-अलग देशों या क्षेत्रों के लोगों के मनोरंजन और लोक-रिवाजों पर आधारित हो (लोक संगीत)। वांग्मय गवाह है कि लोक संगीत ने हमेशा शास्त्रीय संगीत को नई ऊर्जा दी है। आज शास्त्रीय संगीत के कई प्रसिद्ध राग—जैसे राग पहाड़ी, पीलू, मांड, काफी, भैरवी और सारंग—मूल रूप से अलग-अलग प्रांतों की लोक धुनों से ही परिष्कृत करके बनाए गए हैं। भारत एक बहुभाषी देश है। यहाँ हर कुछ किलोमीटर पर बोली बदल जाती है। जब देश की एक बड़ी आबादी निरक्षर थी और प्रिंटिंग प्रेस जैसी कोई सुविधा नहीं थी, तब लोक संगीत ने ही हमारे महान महाकाव्यों, इतिहास और नैतिक मूल्यों को जीवित रखा। वीरगाथाएं: बुंदेलखंड के 'आल्हा-ऊदल', राजस्थान के 'ढोला-मारू' और पंजाब के लोक आख्यानों को लोक गायकों ने अपनी धुनों के माध्यम से सदियों तक जीवित रखा। धार्मिक चेतना में : कबीर के पद, मीरा के भजन, तुलसी के सोहर और रसखान की सवैयाँ पहले लोक धुनों के माध्यम से जन-जन की जुबान पर चढ़ीं, उसके बाद वे लिखित साहित्य का हिस्सा बनीं । भारतीय जीवन पद्धति में जन्म से लेकर मृत्यु तक व्यक्ति 16 संस्कारों से गुजरता है। लोक संगीत इन संस्कारों का जीवंत साथी है:
लोक गीत का प्रकार क्षेत्र/अवसर सांस्कृतिक एवं सामाजिक महत्व में सोहर / मुंडन गीत उत्तर भारत (बिहार, यूपी) बच्चे के जन्म और उसके प्रारंभिक जीवन की खुशियों और दीर्घायु की कामना। विवाह के गीत संपूर्ण भारत हल्दी, मटकोर, परछन और विदाई के समय के मानवीय जज्बातों का मार्मिक प्रकटीकरण।कजरी और झूला सावन मास (उत्तर प्रदेश, बिहार) प्रकृति के सौंदर्य, वर्षा ऋतु और विरह की भावनाओं का उत्सव।फाग / होरी ब्रज और ग्रामीण क्षेत्र वसंत ऋतु के आगमन, आपसी भाईचारे और उल्लास का प्रतीक।बिहू और भांगड़ा असम और पंजाब नई फसल कटने की खुशी में किया जाने वाला ऊर्जावान सामूहिक श्रम-उत्सव।ये लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि ये तत्कालीन समाज के खान-पान, वेशभूषा, पारिवारिक संबंधों और सुख-दुख का ऐतिहासिक व साहित्यिक दस्तावेज हैं।
विश्व के लोक संगीत का वैज्ञानिक पहलो में अक्सर लोक संगीत को केवल 'परंपरा' मानकर छोड़ दिया जाता है, लेकिन इसके पीछे एक गहरा और सटीक विज्ञान काम करता है। आधुनिक विज्ञान, विशेषकर भौतिकी , न्यूरोबायोलॉजी और नृविज्ञान के शोधों ने लोक संगीत के कई चौंकाने वाले वैज्ञानिक पहलुओ त किया है। लोक संगीत में इस्तेमाल होने वाले वाद्य यंत्र (जैसे बांसुरी, ढोलक, इकतारा, सारंगी, मिट्टी के घड़े या तुंबा) पूरी तरह से प्राकृतिक और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों से बनते हैं। ग्रामीण कारीगरों को भले ही भौतिकी की डिग्रियां न मिली हों, लेकिन उन्हें पता होता है कि सूखी लौकी (तुंबा) के खोखलेपन के अंदर हवा का जो कंपन (Resonance) होता है, वह ध्वनि को प्राकृतिक रूप से एम्पलीफाई करता है। पहाड़ी क्षेत्रों में गाए जाने वाले लोक गीत (जैसे आल्प्स पर्वत का 'योडलिंग' या गढ़वाल के पहाड़ी गीत) में बहुत ऊंचे स्वरों (High Pitch) का प्रयोग होता है। विज्ञान के अनुसार, ऊंचे आयाम की ध्वनि तरंगें पहाड़ों की घाटियों में हवा के अवरोध को पार करते हुए बिना बिखरे बहुत दूर तक है। जब कोई मनुष्य अपने पूर्वजों या अपनी मिट्टी का लोक संगीत सुनता है, तो उसके मस्तिष्क में होने वाली हलचल का अध्ययन वैज्ञानिकों ने फंक्शन मैगनेटिक रेजोनेंस इमेजिंग fMRI के जरिए किया है। पेंटाटोनिक स्केल का वैश्विक जादू: दुनिया के लगभग हर हिस्से के लोक संगीत में—चाहे वह भारत का लोक संगीत हो, चीन का पारंपरिक संगीत हो, स्कॉटलैंड के पारंपरिक गीत हों या अफ्रीकी कबीलों की धुनें—'पेंटाटोनिक स्केल' यानी केवल 5 स्वरों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। न्यूरोसाइंस के अनुसार, मानव मस्तिष्क का 'ऑडिटरी कॉर्टेक्स' (सुनने का केंद्र) पांच स्वरों के पैटर्न को सबसे आसानी से पहचानता है, डिकोड करता है और याद रखता है। यही कारण है कि लोक संगीत की धुनें बिना किसी प्रयास के बच्चों से लेकर बड़ों तक के दिमाग में तुरंत बैठ जाती हैं। लोक संगीत सुनते समय मस्तिष्क में डोपामाइन (खुशी देने वाला न्यूरोट्रांसमीटर) और ऑक्सीटोसिन (जुड़ाव महसूस कराने वाला हार्मोन) का तेजी से स्राव होता है। यह शरीर में तनाव पैदा करने वाले हार्मोन कोर्टिसोल के स्तर को तुरंत गिरा देता है। चिकित्सा विज्ञान में आज 'फोक म्यूजिक थेरेपी' का उपयोग अवसाद, अनिद्रा और अल्जाइमर के मरीजों के इलाज में किया जा रहा है।
महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन का मानना था कि इंसानों में भाषा के विकसित होने से पहले ही संगीत की क्षमता आ चुकी थी। लोक संगीत इंसानी वजूद को बचाए रखने का एक जैविक औजार (Evolutionary Tool) रहा है।
जब किसी कबीले या समुदाय के लोग एक साथ लोक नृत्य या सामूहिक गायन करते हैं, तो विज्ञान की भाषा में उनके शरीरों के बीच 'बायोलॉजिकल एंट्रेनमेंट' होता है। इसका मतलब है कि समूह में मौजूद सभी व्यक्तियों की हृदय गति (Heart Rate), सांस लेने की गति और ब्रेन वेव्स (मस्तिष्क तरंगें) एक ही लय में सिंक्रोनाइज (एकसमान) हो जाती हैं। यह वैज्ञानिक प्रक्रिया समाज में आपसी विश्वास और सामूहिक सुरक्षा की भावना को चरम पर ले जाती ह खेतों में धान रोपते समय, नाव चलाते समय या भारी वजन उठाते समय गाए जाने वाले लोकगीत शरीर में एंडोर्फिन नामक प्राकृतिक पेनकिलर हार्मोन छोड़ते हैं। इससे कठिन और थकाऊ शारीरिक श्रम करते समय भी मांसपेशियों में लैक्टिक एसिड के जमाव से होने वाला दर्द महसूस नहीं होता।
लोक संगीत पूरी तरह से अपनी भौगोलिक और पारिस्थितिक परिस्थितियों से नियंत्रित होता है:
मंगोलिया के खुले घास के मैदानों में तेज हवाएं चलती हैं। वहां के लोक गायकों ने ऐसी वैज्ञानिक तकनीक विकसित की जिससे वे अपने गले और डायाफ्राम का उपयोग करके एक ही समय में दो अलग-अलग आवृत्तियों एक बेस (मंद्र) और एक हाई-पिच (तार)—की ध्वनि निकाल सकते हैं, जो तेज हवा को चीरती हुई दूर तक जाती है। राजस्थान के जैसलमेर-बाड़मेर या अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान के लोक संगीत में अलाप बहुत लंबे और स्वर ऊंचे होते हैं। शुष्क हवा में ध्वनि तरंगें तेजी से चलती हैं, और लंबी तान देने से वे रेगिस्तान के सन्नाटे को प्रभावी ढंग से भेद पाती हैं।
भारतीय वांग्मय से लेकर वैश्विक विज्ञान के इस गहन विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि लोक संगीत कोई साधारण या पिछड़ी हुई विधा नहीं है। यह हमारे पूर्वजों द्वारा सदियों के अनुभवों, प्रकृति के निरीक्षण और ध्वनि के गूढ़ नियमों से तैयार किया गया एक जीवंत विज्ञान है। इसकी उत्पत्ति जहाँ ईश्वर की परम चेतना और वेदों की ऋचाओं से मानी गई, वहीं इसकी उपयोगिता को आधुनिक प्रयोगशालाओं ने भी प्रमाणित किया है। आज के इस अत्यधिक मशीनीकृत, डिजिटल और तनावभरे युग में, जहाँ इंसान कंक्रीट के जंगलों में अकेला होता जा रहा है, लोक संगीत हमारे लिए एक 'संजीवनी' की तरह है। यह हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है, हमारे मानसिक स्वास्थ्य को संतुलित रखता है और बिना किसी कृत्रिम साधन के समाज को एक सूत्र में पिरोता है। विश्व संगीत दिवस जैसे अवसर हमें यही याद दिलाते हैं कि हम चाहे कितनी भी प्रगति कर लें, हमारे भीतर की शांति और चेतना आज भी उसी लोक धुन में छिपी है जो सदियों पहले हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के आंगन में गुनगुनाई थी।

करपी , अरवल , बिहार 804419
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