नाजिया खान को मिल रही धमकियां कितनी उचित ?
डॉ राकेश कुमार आर्य
मजहब अक्ल के दखल को पसंद नहीं करता। इसलिए जितने भर भी लोग मजहबपरस्ती के तंग दायरे में रहकर सोचते हैं और उसमें रहने को अपने जीवन की शान समझते हैं ,वे सारे के सारे भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के शत्रु होते हैं। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर उनकी अपनी ही परिभाषा होती है। जिसके अनुसार वह स्वयं को कुछ भी कहने अर्थात बोलने लिखने पढ़ने अर्थात अभिव्यक्ति करने के लिए स्वतंत्र मानते हैं। परंतु दूसरों पर उनका यह दृष्टिकोण यथावत लागू नहीं होता। यहीं से यह बात सिरे से खारिज हो जाती है कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। जब मजहब हमारे मस्तिष्क को संकीर्ण बनाता है हमारी सोच को संकीर्ण बनाता है तो यह हमें दूसरों से बैर करना सिखाता है। जबकि धर्म हमको दूसरों के साथ जोड़ने की बात करता है। इसलिए भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में धर्म को प्राथमिकता दी गई है।
इस्लाम एक ऐसा मजहब है जो व्यक्ति से अकल के दखल से परहेज करने को कहता है। हम अनेक ऐसी घटनाओं के साक्षी बने हैं जब इस्लाम के भीतर ही कुछ प्रचलित अवैज्ञानिक परंपराओं, प्रथाओं या रीतियों के विरुद्ध किसी इस्लामिक विद्वान, लेखक, समाज सुधारक अथवा विचारक या पत्रकार ने आवाज उठाई तो उसे भीतर से ही अनेक प्रकार की धमकियों का सामना करना पड़ा। सलमान रुश्दी के साथ क्या हुआ ? बांग्लादेश की लेखिका तस्लीमा नसरीन के साथ क्या हुआ ? यह किसी से छिपा नहीं है।
अब ऐसा ही कुछ महाराष्ट्र की एक्टिविस्ट नाजिया इलाही खान के साथ हो रहा है। जिन्हें इस्लामिक कट्टरपंथी जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। गला काटने की धमकी और अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले लोग उन्हें आए दिन तनाव दे रहे हैं। इस प्रकार की गतिविधियों पर हमारे धर्मनिरपेक्ष नेता मौन साधे बैठे रहते हैं। यदि ऐसी ही कोई बात हिंदू समाज में हो रही हो तो यही नेता अपने आप को ' सुधारक ' की भूमिका में लाने में देर नहीं करते हैं। राम मंदिर के भ्रष्टाचार को लेकर ये सभी बड़े मुखर होकर बोल रहे हैं। परंतु इसी समय एक मुस्लिम महिला पत्रकार के लिए जान से मारने धमकियां दी जा रही हैं तो उस पर ये सारे ' सुधारक' मौन साधकर बैठ गए हैं। इनका यह दोगलापन देश के लिए बड़ा घातक है। नाजिया खान अपने एक्स अकाउंट पर लिख रही हैं कि उन्हें एक मुस्लिम पत्रकार गालियां दे रहा है तो दूसरा गला काटने की धमकी दे रहा है। वास्तव में उनका यह लिखना मात्र नहीं है बल्कि पूरे मानव समाज के लिए एक आह्वान है कि यदि तुम सचमुच अपने आप को सभ्य समाज के रूप में देखते हो तो इस सभ्य समाज से ऐसी आवाजें क्यों आती हैं ? भारतीय इतिहास के संदर्भ में यदि इस समस्या पर गौर किया जाए तो पता चलता है कि जब से इस्लाम ने यहां प्रवेश किया है तब से ही ऐसी आवाजें आती रही हैं । इस प्रकार नाजिया खान के दो पंक्ति के इस आह्वान को इतिहास का भी आह्वान मानना चाहिए और सोचना चाहिए कि आखिर ऐसा कब तक चलेगा ?
यदि हम आज तक भी यह नहीं समझ पाए हैं कि प्रगतिशीलता क्या है और कुरीतियों पर बोलना क्यों आवश्यक है तो फिर 21 वीं सदी के आज के विश्व को वैज्ञानिक युग कहना किसी भी दृष्टिकोण से भी उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की एक निर्भीक अधिवक्ता नाजिया खान दबंग महिला के रूप में जानी जाती हैं। वह बहुत ही तार्किक बोलती हैं और उनके बोलने को यदि सही दृष्टिकोण और सही संदर्भ में लिया अथवा समझा जाए तो उनके बोलने से सबसे अधिक लाभ मुस्लिम समाज के उन लोगों को ही मिलता है जो मुस्लिम कट्टरपंथियों और मौलवियों की गुलामी आज भी भोग रहे हैं। इनमें भी हलाला जैसी परंपरा को झेल रहीं मुस्लिम महिलाओं को विशेष लाभ मिलता है। उन्हें आज के वैज्ञानिक युग में खुलकर सोचने और बोलने का अवसर और हिम्मत मिलती है। उन्हें पता चलता है कि 72 हूरों का कॉन्सेप्ट क्या है ? सर तन से जुदा का अर्थ क्या है ? बुर्का और हिजाब या नकाब के पीछे मुस्लिम पुरुष समाज की सोच क्या है ? औरतों को मर्दों के साथ खड़े होकर नमाज न पढ़ने देने के पीछे कट्टरपंथियों का उद्देश्य क्या है ? आज के समय में निश्चित रूप से इन विषयों पर मुस्लिम समाज में खुलकर चर्चा होनी चाहिए। यदि इसके लिए कोई नाजिया सामने आ रही है तो उसे शत्रु न समझ कर सुधारक समझना चाहिए। मोहम्मद साहब का इस्लाम भी यही कहता है। इसके उपरांत भी यदि मुस्लिम कट्टरपंथी अपनी सोच और अपनी मान्यताओं को वैज्ञानिक सिद्ध कर सकते हैं तो यह आवश्यक नहीं कि नाजिया खान को ही प्राथमिकता दी जाए। यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि इस्लामी समाज के भीतर मिलने वाली इन मान्यताओं या परंपराओं को वैज्ञानिक सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक बुद्धि की भी आवश्यकता होगी। यह बहुत ही दुख के साथ कहना पड़ता है कि वह बुद्धि इन कट्टरपंथियों या मौलवियों के पास मिलनी संभव नहीं है। इसीलिए ये लोग अकल के दखल को पसंद नहीं करते।... इसलिए इनको सलमान रुश्दी, तस्लीमा नसरीन, नाजिया खान या आरजू कासमी अच्छे नहीं लगती।
इस्लाम की तौहीन इसमें नहीं है कि कोई खुलकर क्यों बोल रहा है ? इस्लाम की तौहीन तो इसमें है कि आप उसे बोलने ना दें। माना जा सकता है कि बोलने वाले को अपनी सीमाओं का पालन करना चाहिए,परंतु सीमाओं का पालन करने की अपेक्षा का अर्थ यह नहीं कि एक अच्छी और सच्ची बात आने से ही रोक दी जाए।
एक वीडियो साँझा करते हुए नाजिया ने लिखा है, “ये सलमान हैं, एक मुस्लिम पत्रकार! ये शायद महाराष्ट्र से हैं! ये पत्रकार लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का प्रतिनिधित्व करते हैं, फिर भी इस रिपोर्ट में ये मुझे वेश्या कह रहे हैं! क्या किसी मुस्लिम पत्रकार के लिए किसी महिला पर गंदी और अपमानजनक बातें कहना जायज है ? इसीलिए ये खुलेआम मुझे वेश्या कह रहे हैं!” ऐसी ही दूसरी वीडियो साँझा करते हुए नाजिया ने लिखा, “यह महाराष्ट्र के औरंगाबाद का अब्दुल है, जो मेरा गला काटने की धमकी देते हुए वीडियो बना रहा है! और वह जेल जाने को भी तैयार है!”
वीडियो में अब्दुल कहता है, “तू कौन होती है हमरा नबी के खिलाफ बोलने वाली। तेरा ऐसा हाल करूँगा कि कभी नहीं भूलेगी। चाहे जेल क्यों न जाना पड़े।”
निश्चित रूप से इस प्रकार के अपशब्दों का प्रयोग करने वाले लोगों के विरुद्ध कानून को सख्ती से पेश आना चाहिए।
धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत यह नहीं कहता कि आप समाज सुधार के बिंदु पर मौन हो जाएं ।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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