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देख यौवन उभार, झूम रहा संसार

देख यौवन उभार, झूम रहा संसार

कुमार महेंद्र
शबनम की बूँदों में झलकी,
आज मिलन की भोर।
तेरी कजरारी मोहक आंखें,
आज बनीं चित-चोर।
मंद समीर ने राग छेड़ा,
ज्यों पायल की झंकार।
देख यौवन उभार, झूम रहा संसार।।


साँसों में चम्पा महकी है,
तन पर सावन का रंग।
तेरे कोमल स्पर्शों से,
जागी प्रणय-तरंग।
तेरी चंचल चितवन पर ही,
मेरा जीवन निसार।
देख यौवन उभार, झूम रहा संसार।।


तुम चपला बन नभ में चमकी,
मैं सावन का घन गंभीर।
तुम कल-कल बहती सरिता हो,
मैं तट का मौन नीर।
तेरे रूप-सुधा के आगे,
फीका हर सौंदर्य-श्रृंगार।
देख यौवन उभार, झूम रहा संसार।।


हाथों में लेकर हाथ तेरा,
क्षण भी युग-से बीते।
तेरी मधुमय संगति पाकर,
सपने सारे जीते।
मन के सूने आँगन में अब,
खिला प्रेम-उपहार।
देख यौवन उभार, झूम रहा संसार।।


अधरों पर मुस्कान तुम्हारी,
ज्यों उषा की लालिमा।
तेरे नयनों में बसती है,
प्रेम-सुधा की गरिमा।
तेरी छवि से आलोकित है,
मेरी साँसों का आधार।
देख यौवन उभार, झूम रहा संसार।।




(स्वरचित मौलिक रचना)
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