डिजिटल इंडिया : सपना, हकीकत और बढ़ती विडंबनाएँ
- क्या डिजिटल इंडिया अब आम नागरिकों के लिए एक मज़ाक बनता जा रहा है?
-डॉ. राकेश दत्त मिश्र
सन् 2015 में जब "डिजिटल इंडिया" अभियान की शुरुआत हुई थी, तब देशवासियों के मन में एक नई उम्मीद जगी थी। यह कहा गया कि भारत को डिजिटल रूप से सशक्त समाज और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तित किया जाएगा। सरकारी सेवाएँ ऑनलाइन होंगी, भ्रष्टाचार कम होगा, कार्यालयों के चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और नागरिक अपने घर बैठे ही अधिकांश कार्य कर सकेंगे। यह विचार न केवल आधुनिक था, बल्कि समय की आवश्यकता भी था।
आज लगभग एक दशक बाद जब हम इस अभियान की उपलब्धियों और चुनौतियों का मूल्यांकन करते हैं, तो तस्वीर उतनी उत्साहजनक नहीं दिखती जितनी दिखाई गई थी। डिजिटल इंडिया का सपना जितना आकर्षक था, उसकी जमीनी हकीकत उतनी ही परेशान करने वाली प्रतीत होती है। विशेष रूप से सरकारी पोर्टलों की लगातार विफलता, सर्वर की खराबी, तकनीकी खामियाँ और उपयोगकर्ताओं की बढ़ती परेशानियाँ यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हम वास्तव में डिजिटल भारत की ओर बढ़ रहे हैं या केवल डिजिटल घोषणाओं के सहारे आगे बढ़ने का भ्रम पैदा कर रहे हैं।
डिजिटल क्रांति या डिजिटल निर्भरता?
आज देश का लगभग हर सरकारी विभाग डिजिटल हो चुका है। बैंकिंग, रेलवे, आयकर, जीएसटी, बीमा, छात्रवृत्ति, पेंशन, राशन, पासपोर्ट, आधार, भूमि अभिलेख, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाएँ ऑनलाइन प्लेटफार्मों पर निर्भर हो चुकी हैं।
सैद्धांतिक रूप से यह व्यवस्था उत्कृष्ट है, लेकिन जब पूरा तंत्र तकनीक पर निर्भर हो जाए और वही तकनीक बार-बार विफल होने लगे, तब समस्या और भी गंभीर हो जाती है।
पहले यदि किसी कार्यालय में तकनीकी समस्या होती थी तो वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध रहती थी। आज अधिकांश सेवाओं में मैनुअल विकल्प लगभग समाप्त कर दिए गए हैं। ऐसे में पोर्टल बंद होते ही पूरा सिस्टम ठप पड़ जाता है और नागरिक असहाय होकर स्क्रीन के सामने बैठा रह जाता है।
जीएसटी पोर्टल : शुरुआत से ही संघर्ष
भारत में जीएसटी को "एक राष्ट्र, एक कर" की ऐतिहासिक व्यवस्था बताया गया था। लेकिन इसका डिजिटल ढाँचा प्रारंभ से ही सवालों के घेरे में रहा है।
देश के लाखों व्यापारी और कर सलाहकार वर्षों से यह शिकायत करते आ रहे हैं कि जीएसटी पोर्टल अक्सर धीमा पड़ जाता है, डेटा अपलोड नहीं होता, रिटर्न फाइलिंग के समय सर्वर व्यस्त रहता है और तकनीकी त्रुटियों के कारण अनावश्यक नोटिस तक जारी हो जाते हैं।
कई बार अंतिम तिथियों के निकट पोर्टल इतना धीमा हो जाता है कि रिटर्न दाखिल करना लगभग असंभव हो जाता है। परिणामस्वरूप व्यवसायियों को आर्थिक दंड और मानसिक तनाव दोनों का सामना करना पड़ता है।
विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था को कर प्रणाली को सरल बनाना था, वही अनेक लोगों के लिए अतिरिक्त परेशानी का कारण बन गई है।
आयकर पोर्टल की कहानी
कुछ वर्ष पहले आयकर विभाग की नई वेबसाइट बड़े उत्साह के साथ लॉन्च की गई थी। इसे अत्याधुनिक और विश्वस्तरीय प्लेटफॉर्म बताया गया था। लेकिन लॉन्च के बाद महीनों तक करदाता और चार्टर्ड अकाउंटेंट परेशान रहे।
रिटर्न फाइल नहीं हो रहे थे, पुराने रिकॉर्ड दिखाई नहीं दे रहे थे, सत्यापन में दिक्कतें आ रही थीं और रिफंड की जानकारी प्राप्त करना भी कठिन हो गया था।
देश के लाखों करदाता यह सोचने को मजबूर हो गए कि यदि सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय पोर्टल ही विश्वसनीय नहीं होगा तो डिजिटल प्रशासन पर विश्वास कैसे कायम रहेगा?
एलआईसी : डिजिटल युग में भी संघर्षरत
अब बात देश की सबसे बड़ी और सबसे विश्वसनीय बीमा संस्था, Life Insurance Corporation of India (LIC) की।
एलआईसी केवल एक बीमा कंपनी नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीय परिवारों के आर्थिक विश्वास का प्रतीक है। देश के दूरदराज़ गांवों से लेकर महानगरों तक एलआईसी की पहुँच है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में एलआईसी आज भी गंभीर चुनौतियों से जूझती दिखाई देती है।
एलआईसी का आधिकारिक पोर्टल और मोबाइल एप्लीकेशन अक्सर तकनीकी समस्याओं से घिरे रहते हैं। कभी लॉगिन नहीं होता, कभी डेटा अपडेट नहीं होता, कभी प्रीमियम भुगतान की प्रक्रिया बाधित हो जाती है तो कभी एजेंट आवश्यक जानकारी प्राप्त नहीं कर पाते।
तकनीकी समस्या एक-दो दिन की हो तो समझी जा सकती है, लेकिन जब यह लगातार बनी रहे तो यह केवल तकनीकी दोष नहीं बल्कि प्रबंधन की विफलता मानी जाएगी।
थर्ड पार्टी एप्लीकेशनों पर रोक का प्रभाव
एलआईसी एजेंट वर्षों से विभिन्न अधिकृत डिजिटल माध्यमों और सहायक एप्लीकेशनों की सहायता से ग्राहकों को बेहतर सेवाएँ प्रदान करते रहे हैं। लेकिन जब कई थर्ड पार्टी प्लेटफॉर्म बंद कर दिए गए या उनकी पहुँच सीमित कर दी गई, तब एजेंटों की कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
आज अनेक एजेंट शिकायत करते हैं कि जिन कार्यों में पहले कुछ मिनट लगते थे, अब उनमें कई घंटे लग जाते हैं। कई बार ग्राहकों को सही समय पर जानकारी नहीं मिल पाती। इससे एजेंट की छवि भी प्रभावित होती है और संस्था की भी।
सबसे अधिक प्रभावित कौन?
सरकारी पोर्टलों की विफलता का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव आम नागरिक पर पड़ता है।
एक छात्र छात्रवृत्ति के लिए आवेदन नहीं कर पाता।
एक किसान अपनी योजना की स्थिति नहीं देख पाता।
एक व्यापारी समय पर रिटर्न नहीं भर पाता।
एक करदाता अपना रिफंड नहीं जान पाता।
एक बीमा ग्राहक अपनी पॉलिसी की जानकारी प्राप्त नहीं कर पाता।
एक एलआईसी एजेंट ग्राहक को समय पर सेवा नहीं दे पाता।
तकनीकी विफलताओं का बोझ अंततः उसी नागरिक पर पड़ता है जिसके नाम पर डिजिटल इंडिया की कल्पना की गई थी।
करोड़ों रुपये खर्च, फिर भी समस्या क्यों?
यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
सरकारी पोर्टलों के विकास, रखरखाव और उन्नयन पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। देश में विश्वस्तरीय आईटी कंपनियाँ हैं, कुशल इंजीनियर हैं और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं।
फिर भी यदि पोर्टल बार-बार ठप हो रहे हैं तो इसके पीछे कुछ गंभीर कारण हो सकते हैं—
परियोजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी।
पर्याप्त परीक्षण के बिना पोर्टलों का शुभारंभ।
उपयोगकर्ता अनुभव की उपेक्षा।
सर्वर क्षमता का अपर्याप्त होना।
जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था का अभाव।
तकनीकी रखरखाव में लापरवाही।
जब तक इन मूल समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक नए पोर्टल बनते रहेंगे और पुरानी समस्याएँ भी बनी रहेंगी।
डिजिटल इंडिया को बचाने के लिए क्या करना होगा?
डिजिटल इंडिया की आलोचना करना उद्देश्य नहीं है। उद्देश्य उसकी कमियों को उजागर कर उसे अधिक प्रभावी बनाना है।
इसके लिए आवश्यक है कि-
- प्रत्येक सरकारी पोर्टल की स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराई जाए।
- उपयोगकर्ताओं की शिकायतों के लिए 24×7 सहायता प्रणाली विकसित की जाए।
- सर्वर क्षमता को वास्तविक उपयोग के अनुरूप बढ़ाया जाए।
- किसी भी नई प्रणाली को लागू करने से पहले व्यापक परीक्षण किया जाए।
- एजेंटों, कर सलाहकारों, व्यापारियों और नागरिकों से नियमित फीडबैक लिया जाए।
- डिजिटल सेवाओं के साथ सीमित वैकल्पिक ऑफलाइन व्यवस्था भी उपलब्ध रहे।
निष्कर्ष
डिजिटल इंडिया भारत के भविष्य का एक महत्वपूर्ण सपना है। इसने अनेक क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन भी किए हैं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि सरकारी पोर्टलों की बार-बार की विफलता, तकनीकी अव्यवस्था और उपयोगकर्ताओं की बढ़ती परेशानी इस अभियान की विश्वसनीयता को कमजोर कर रही है।
डिजिटल भारत का अर्थ केवल वेबसाइट बनाना, ऐप लॉन्च करना या विज्ञापन जारी करना नहीं है। वास्तविक सफलता तब होगी जब नागरिक बिना किसी बाधा के, बिना किसी तकनीकी संघर्ष के, सहजता से सेवाओं का लाभ उठा सके।
यदि करोड़ों लोगों को बार-बार यही सुनना पड़े कि "सर्वर डाउन है", "कृपया बाद में प्रयास करें" या "तकनीकी कारणों से सेवा उपलब्ध नहीं है", तो यह केवल एक तकनीकी समस्या नहीं बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है।
समय आ गया है कि सरकार और संबंधित संस्थाएँ आत्ममंथन करें। डिजिटल इंडिया को नारे से निकालकर वास्तविक जनसेवा का माध्यम बनाया जाए। अन्यथा यह आशंका निराधार नहीं होगी कि जिस अभियान को भारत की डिजिटल क्रांति का प्रतीक बनना था, वह आम नागरिकों की नजर में धीरे-धीरे एक विडंबना और मज़ाक का विषय बनता जा रहा है।
लेखक डॉ. राकेश दत्त मिश्र दिव्य रश्मि के सम्पादक एवं समाजिक चिंतक और लेखक है |
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