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रम्य सौम्य देश हमारा

"भारत की प्रकृति, संस्कृति, विविधता और एकता को समर्पित एक विनम्र काव्यांजलि।मातृभूमि की पावन महिमा को शब्दों में पिरोने का एक छोटा सा प्रयास। "

रम्य सौम्य देश हमारा

कुमार महेंद्र
हिमगिरि उत्तर मुकुट मणि-सा,
दक्षिण सिंधु अपार।
पूर्व दिशाएँ हरित सुरभित,
पश्चिम मरु विस्तार।
मध्य बहें कल-कल सरिताएँ,
अंतस मंगलमय सुधा-धारा।
रम्य सौम्य देश हमारा।।


हिंदभूमि सौंदर्य-माधुर्य,
शांति-अहिंसा धाम।
गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र से,
पावन इसका नाम।
उपजाऊ समतल धरती पर,
समृद्धि का उजियारा।
रम्य सौम्य देश हमारा।।


राजस्थानी मरु की महिमा,
अल्प नीर अभिमान।
नीलगिरि के चाय-बाग से,
महके दक्षिण-प्राण।
चेरापूंजी मेघ-वृष्टि से,
हरित हुआ जग सारा।
रम्य सौम्य देश हमारा।।


केरल तट नारियल-विटपों,
से गाता मधु-गान।
कच्छ रण की धवल धरा पर,
झलके गौरव-मान।
गोवा का मनमोहक सागर,
पर्यटन का सितारा।
रम्य सौम्य देश हमारा।।


अंडमान-लक्षद्वीप सुशोभित,
मोती-जड़ित किनार।
चारों दिशा विविध रंगों से,
रचती अनुपम हार।
पर्वत, पठार, झील, निर्झर,
प्रकृति का जयकारा।
रम्य सौम्य देश हमारा।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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