काशी नगरी
अरुण दिव्यांशकाशी नगरी है काश का ,
भोलेदानी के ये वास का ।
शिवशंकर जी खास का ,
हर पाप समूल नाश का ।।
कालों के होते काल का ,
उमा पार्वती ससुराल का ।
है भभूतवाले कपाल का ,
वो पहने व्याघ्र छाल का ।।
यह धरती है भूतनाथ का ,
अर्द्धभंगी शिव माथ का ।
जो होते देवों के देव औ ,
उन्हीं नाथों के नाथ का ।।
शिवशंभू का काशी नगरी ,
दया का है परिपूर्ण गगरी ।
परम दयालु दान के दाता ,
विख्यात प्रख्यात सगरी ।।
अर्द्धभंगी व अर्द्धनारीश्वर ,
जो हैं ईश्वरों के ही ईश्वर ।
जो कहलाते संहारकर्ता ,
साक्षात् जगत जगदीश्वर ।।
धरा पे रह धरा से अलग ,
त्रिशूल बसा काशी नगरी ।
बसहा बैलवाले उमापति ,
चले भांग धतूरा के डगरी ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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