Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों की व्यापक संवैधानिक समीक्षा आवश्यक है?

क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों की व्यापक संवैधानिक समीक्षा आवश्यक है?

रमेश कुमार चौबे

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जहाँ प्रत्येक नागरिक और संगठन को संविधान के दायरे में रहते हुए अपने विचार व्यक्त करने तथा अपनी गतिविधियों का संचालन करने का अधिकार प्राप्त है। इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विशेषता है कि यहाँ सरकारों, राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और वैचारिक संस्थाओं की सार्वजनिक समीक्षा और आलोचना भी की जा सकती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भारत का एक प्रभावशाली सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन माना जाता है। इसकी स्थापना 1925 में हुई थी और आज यह देश के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में गिना जाता है। संघ स्वयं को एक सांस्कृतिक एवं राष्ट्रवादी संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि इसके आलोचक इसे एक विशिष्ट वैचारिक एजेंडे का वाहक मानते हैं। यही कारण है कि संघ को लेकर दशकों से समर्थन और विरोध दोनों प्रकार की बहसें चलती रही हैं।

लोकतंत्र में प्रश्न पूछने का अधिकार


किसी भी लोकतांत्रिक समाज में यह प्रश्न उठाना अस्वाभाविक नहीं है कि कोई संगठन संविधान की मूल भावना, सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप कार्य कर रहा है या नहीं। यह अधिकार नागरिकों, सामाजिक संगठनों, मीडिया और राजनीतिक दलों को समान रूप से प्राप्त है।

इसी संदर्भ में कुछ बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता यह तर्क देते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक गतिविधियों, उसके आर्थिक स्रोतों, उसकी सहयोगी संस्थाओं तथा उसके सामाजिक प्रभावों का समय-समय पर स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए।

आतंकवाद की परिभाषा और वैचारिक प्रभाव


आतंकवाद सामान्यतः हिंसा, भय और दबाव के माध्यम से राजनीतिक या सामाजिक उद्देश्यों को प्राप्त करने की कोशिश से जुड़ा माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आतंकवाद की परिभाषा मुख्य रूप से हिंसक गतिविधियों, नागरिकों को नुकसान पहुँचाने तथा राज्य व्यवस्था को अस्थिर करने वाले कृत्यों से संबंधित है।

हालाँकि कुछ विद्वान "बौद्धिक आतंकवाद" या "वैचारिक आतंकवाद" जैसी अवधारणाओं पर भी चर्चा करते हैं। उनके अनुसार यदि कोई विचारधारा समाज में भय, घृणा, विभाजन या वैमनस्य को व्यवस्थित रूप से बढ़ावा देती है, तो उसकी भी आलोचनात्मक समीक्षा की जानी चाहिए। यह एक अकादमिक और राजनीतिक बहस का विषय है, जिस पर विभिन्न मत मौजूद हैं।

संघ पर लगे प्रतिबंधों का इतिहास

भारतीय इतिहास में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर तीन प्रमुख अवसरों पर प्रतिबंध लगाया गया-

  • 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद।
  • 1975 में आपातकाल के दौरान।
  • 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद।

इन तीनों अवसरों पर प्रतिबंध लगाए गए, किंतु बाद में कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के पश्चात उन्हें हटा लिया गया। अब तक किसी भारतीय न्यायालय ने RSS को आतंकवादी संगठन घोषित नहीं किया है।

यही तथ्य संघ के समर्थक अपनी वैधता के पक्ष में प्रस्तुत करते हैं। वहीं आलोचकों का कहना है कि संघ की गतिविधियों और उसके सामाजिक प्रभावों का व्यापक अध्ययन अभी भी आवश्यक है।
संघ और राजनीति

यह सर्वविदित है कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच वैचारिक निकटता है। भारतीय राजनीति में अनेक प्रमुख नेताओं का संबंध संघ की पृष्ठभूमि से रहा है। समर्थक इसे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सकारात्मक योगदान मानते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक प्रभाव का विस्तार बताते हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह बहस स्वाभाविक है कि किसी सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन का राजनीतिक दलों पर कितना प्रभाव होना चाहिए और उसकी सीमाएँ क्या होनी चाहिए।

सामाजिक समरसता का प्रश्न


संघ के आलोचक आरोप लगाते हैं कि उसकी विचारधारा समाज में धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती है। दूसरी ओर संघ और उसके समर्थक दावा करते हैं कि उनका उद्देश्य सांस्कृतिक पुनर्जागरण, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सेवा है।

इस विरोधाभास को समझने के लिए आवश्यक है कि स्वतंत्र शोध संस्थान, विश्वविद्यालय और संवैधानिक निकाय निष्पक्ष अध्ययन करें तथा तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष प्रस्तुत करें।

संवैधानिक जाँच की आवश्यकता

किसी भी बड़े संगठन-चाहे वह धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक या वैचारिक हो को संविधान और कानून के दायरे में रहकर कार्य करना चाहिए। यदि किसी संगठन पर गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो उन आरोपों की जाँच निष्पक्ष एजेंसियों द्वारा की जानी चाहिए।

लोकतंत्र में किसी संगठन को दोषी या निर्दोष ठहराने का अधिकार केवल न्यायिक और संवैधानिक संस्थाओं को है, न कि जनभावनाओं या राजनीतिक आरोपों को।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर देश में लंबे समय से बहस चलती रही है और भविष्य में भी चलती रहेगी। लोकतंत्र की शक्ति इसी में है कि वह आलोचना और समर्थन दोनों को स्थान देता है। आवश्यकता इस बात की है कि किसी भी संगठन का मूल्यांकन तथ्यों, संविधान और कानून के आधार पर हो, न कि केवल भावनाओं, प्रचार या पूर्वाग्रहों के आधार पर।

यदि संघ के आलोचकों के आरोपों में दम है तो उनकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं तो उन्हें तथ्यों के आधार पर खारिज किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय न्याय, प्रमाण और संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए।

लेखक : रमेश कुमार चौबे
यह लेखक के निजी विचार हैं। इसका दिव्य रश्मि चैनल, उसके संपादकीय मंडल अथवा प्रकाशक से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है।

हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ