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तुम्हें देख, प्रणय प्रसून खिले सजीले

तुम्हें देख, प्रणय प्रसून खिले सजीले

कुमार महेन्द्र
मुखमंडल नव-कमल सुशोभित,
दृष्टि में अनुराग अथाह।
भाव-भंगिमा शशि-सी चारु,
झरता सुधामय मधु-प्रवाह।
चाल तुम्हारी चंचल मयूरी,
नयन सलोने स्वप्न रंगीले।
तुम्हें देख, प्रणय प्रसून खिले सजीले।।


परिधानों से झरे सुरभि-सी,
मधुऋतु की मादक परछाई।
आत्मिकता की उज्ज्वल आभा,
मन वीणा में राग समाई।
सरस मधुर संवाद तुम्हारे,
हिय में रचते चित्र छबीले।
तुम्हें देख, प्रणय प्रसून खिले सजीले।।


बिंदी-सिंदूर छटा मनोहर,
चूड़ी-पायल मधुर झंकार।
स्वर में मधु-अर्णव की गूँजें,
शब्द बिखेरें प्रेम अपार।
अंग-अंग अरुणिम प्रभात-सा,
अधर सुधा से भरे रसीले।
तुम्हें देख, प्रणय प्रसून खिले सजीले।।


केश-लहरियाँ घन-श्यामल-सी,
शील-सुगंधित हर व्यवहार।
नेह-तरंगित अंतःकरण में,
प्रेम रचे नव स्वर्णिम संसार।
मिलन-प्रतीक्षा में लोचन मेरे,
बन जाते सावन गीले।
तुम्हें देख, प्रणय प्रसून खिले सजीले।।


रूप तुम्हारा सृष्टि-विभूति-सा,
मृदु मुस्कान मधुमास बनी।
स्पर्श कल्पना से ही मन में,
प्रेम-सुधा की प्यास जगी।
तुम जीवन की मधुर कामना,
भाग्य-विहँसते पुष्प नशीले।
तुम्हें देख, प्रणय प्रसून खिले सजीले।।


कुमार महेन्द्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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