खत ( एक पिता का अपना बेटा के नाम )
जय प्रकाश कुवंरबहुत अछुधा मन से बबुआ,
तोह के लिखत बानी पाती।
अंखियन में लोर भरल बा,
डंहकत बा हमार छाती।।
बड़ा मिहनत मजदूरी क के,
तोहरा के पलनीं आ पढ़वनी।
जरत धूप में किसानी क के,
आपन पीठ हम जरवनीं।।
पढ़ के जब तोहर नौकरी लागल,
हमरा बड़ा खुशी भइल।
अब हमारा बुझाइल जे,
परिवार के दुख के दिन गइल।।
तोहरा नौकरी आ कमाई से,
हमरा बड़ा आश लागल।
हमरा बुझाइल अब घर के,
दुख सब भागल।।
खुशी से तोहार शादी क के,
घर के परंपरा हम निभवनी।
तोहरा माई खातिर पतोहू ला के,
उनकर मन हम हुलसवनी।।
जब से आपन पत्नी ले के,
नौकरी पर शहर में तू गइल।
लागत बा कि ओकरा बाद,
आपन माई बाबू के भूल गइल।।
बहुत दिन बीत गइल,
ना कौनों चिठ्ठी ना संबाद बा।
रामखेलावन तोहरा पास से अइले,
कहले जे, बेटवा तोहार आबाद बा।।
माई तोहर बुढ़िया भइली,
अब चुल्हा चौका ना करत बाड़ी।
चुल्हा में आंच फूंक के,
पास बैठ खाली कुहुकत बाड़ी।।
उमर भइल हमरा से भी,
अब मिहनत मजदूरी होत नइखे।
पइसा रुपया हाथ में ना होखे से,
दिन भी अब सरकत नइखे।।
तोहरा कमाई से हमनी पास,
एको पइसा आवत ना बा।
जेकरा से पहिले उधार लेले रहनी,
से लोग रोज किंवाड़ खटखटावत बा।।
तनिको सा बरसात होता,
घर आपन चुवत बा।
कहाँ से हम फेरवट कराईं,
समझ में ना आवत बा।।
तनिकी सा खेत के लगान भी,
बहुते साल से बाकी बा।
पटवारी असुले रोज आवत बाड़े,
बुद्धि कवनो काम ना करत बा।।
मरनी हरनी में हित नाता से,
लागत बा नेवता हांकारी छूट जाई।
पइसा का अभाव में, हित नाता भी,
अब, हमनीं के कवनो काम ना आई।।
पइसा बिना ना चुल्हा जली,
ना खेती बारी होखे पाई।
देखते देखते जे तनकी भर जमीं बा,
उहो लागत बा बंजर हो जाई।।
बबुआ हो, घर गृहस्थी में,
पइसा के ढेगे ढेगे दरकार बा।
शहर में बैठ चुप्पी साधला से लागत बा,
अब तोहरा खाली मेहरारू से दरकार बा।।
मन ना करत रहल ह,
तोहरा पास घर के इ हाल लिखीं।
बाकिर ना जनवले भी,
दिनों दिन घर खस्ता हाल हो जाई।
बड़ा कष्ट सह के,
इ गृहस्थी संभलले रहनी ह,
लगत बा अब सब डुब जाई।।
हमार खत पढ़ के,
बुरा मत मनीह बबुआ।
कमासुत लइका से हर घर में,
कुछ नीमन आश बंधेला।
मोट बात तू जिनिगी में अतने जनीह,
घर चलावे खातिर,
कमासुत औलाद के कुछ फर्ज बनेला।।
एह से बेसी बबुआ,
अब हमारा से कुछ ना लिखल जाई।
दुख के दिन में भी कुहकत कुहकत,
तोहरा बुढ़ा बुढ़ी माई बाबू के दिन,
कइसहूं कटिये जाई।।
खत के अंत में तूं लोग के,
हमनी माई बाबू आशीर्वाद देत बानी।
ईश्वर तोहरा लोगन के,
खुश राखस आ सुबुद्धि देस,
आउर सुखी रहऽ तूं दुनो प्राणी।।
जय प्रकाश कुवंर
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