"अंतर्नाद का उजास"
पंकज शर्मा
अदृश्य है, पर व्याप्त है,
कण-कण में जो अनुस्यूत है।
चर्मचक्षुओं से परे,
सृष्टि का अद्भुत सूत है।
शब्दहीन है वह स्वर,
जो धड़कनों में गूंजता।
मौन की उस ओट में,
मन जिसे है खोजता।
वायु सा अमूर्त वो,
प्राण में स्पंदित रहे।
नेत्र देख पाते नहीं,
चेतना में जो बहे।
न रंग उसका, न रूप कोई,
वह असीम, निर्बाध है।
जो पा गया अंतर्मन में उसे,
उसकी सफल हर साध है।
जब मिटे मन का तिमिर,
अनुभूति का अहसास हो।
तब समझ लेना वही,
परमात्मा का पास हो।
ज्ञान की भाषा नहीं,
भाव का यह खेल है।
आत्मा से आत्मा का,
यह अलौकिक मेल है।
वह सत्य का प्रतिमान है,
हर जीव में जो वास करे।
पहचान ले जो मौन को,
वह ब्रह्म का आभास करे।
खोज मत बाहर उसे,
वह स्वयं में लीन है।
जिसने जाना उस परम को,
वह भक्ति में विलीन है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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