मनुष्य और स्वार्थ
जय प्रकाश कुवंर
स्वार्थ का अर्थ है केवल अपना भला, अपना मतलब अथवा हित तथा अपना लाभ सोचना। इस प्रवृत्ति में मनुष्य दूसरे की परवाह किये बिना केवल अपने सुख और स्वार्थ की सिद्धि के लिए चिंतित रहता है। ऐसी परिस्थिति में मनुष्य अपने लाभ के लिए दूसरों की हितों तथा भावनाओं को नजरअंदाज कर देता है।
ईश्वर ने इस पृथ्वी और इस पर रहने वाले समस्त वस्तुओं एवं जीवन की रचना इस प्रकार की है कि पृथ्वी पर सभी प्राणी एक दूसरे के लिए जीते हैं। पशु पक्षी तथा वनस्पति अन्यों को कुछ न कुछ देते ही रहते हैं। इस पृथ्वी पर केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो स्वयं के लिए जीता है। मनुष्य पशु पक्षी, वनस्पति और यहाँ तक की खुद मनुष्य दूसरे मनुष्य से भी कुछ न कुछ लेता ही रहता है।
ईश्वर निर्मित तथा संचालित धरती, गगन, सूर्य, चांद, तारे तथा वायु आदि कभी अपना स्वार्थ नहीं देखते हैं। जिस दिन ये सभी भी स्वार्थी हो गये होते तो यह दुनिया और हम सब कब के मिट गये होते।
मनुष्य का मैं अथवा उसका अहंकार केवल अपने लाभ, खुशी और अहंकार की पूर्ति के बारे में हमेशा सोचता रहता है, भले इसके लिए दूसरों का जितना भी नुकसान क्यों न हो जाये या फिर उसकी जान ही क्यों न चली जाए।
स्वार्थ के संबंध में रामचरितमानस में एक प्रसंग आया है, जिसमें वनवास की अपनी अवधि में जब श्री राम सुग्रीव से मित्रता करने जाते हैं तो वो सुग्रीव को समझाते हुए दुनिया की सच्चाई बता रहे हैं। उनका कहना है कि संसार में ज्यादातर रिश्ते और प्रेम किसी न किसी स्वार्थ, जरूरत या लाभ पर टिके होते हैं। जब तक स्वार्थ की पूर्ति होते रहता है, लोग प्रेम करते हैं और स्वार्थ पुरा हो जाने पर संबंध भी अक्सर टूट जाते हैं।
रामचरितमानस की चौपाई :
सुर नर मुनि सब कै यह रीती।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति।।
आमतौर पर इस संसार में इंसान के जीवन की शुरुआत ही स्वार्थ से होती है। हम सब सुख में भगवान का स्मरण कम ही करते हैं। लेकिन दुख पड़ने पर हमें भगवान की याद आने लगती है। ऐसी अवस्था में हम भगवान की पूजा के नाम पर उनके दरबार में अपने स्वार्थ की एक लम्बी लिस्ट लेकर कुछ चढ़ावा के साथ पहुँच जाते हैं और उनसे उसकी पूर्ति के लिए माथा पटकते हैं। यही है भगवान से सच्चा प्रेम और अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए उनकी पूजा।
मनुष्य इस संसार में उंच नीच का भेदभाव करने में कभी चुकता नहीं है। लेकिन जब बात उसके मतलब की आती है,तब वह सब कुछ भुला देता है और अपने मतलब सिद्धि के लिए नीच से नीच से भी संबंध जोड़ने से चुकता नहीं है।
मक्खी को वह भगाता है, क्योंकि उससे कोई लाभ नहीं है। वहीं मनुष्य मधुमक्खी पालता है, क्योंकि उससे पौष्टिक मधु प्राप्त होता है। साधारण कीड़े मकोड़ों को वह अपने पास फटकने भी नहीं देता है, जिनसे उसे कोई लाभ नहीं है। उसी जगह मनुष्य रेशम के कीड़े पालता है, क्योंकि उससे रेशम का धागा प्राप्त होता है, जिससे कीमती रेशमी वस्त्र बनते हैं।
इस संबंध में भी रामचरितमानस में एक प्रसंग आया है, जिसमें काकभुशुण्डि जी स्वार्थ की बात गरूड़ जी को समझाते हुए कहते हैं कि :-
पाट कीट ते होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर।
कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम।।
रेशम का कीड़ा बहुत ही घिनौना होता है। लेकिन सुंदर रेशमी वस्त्र बनाने और पहनने के लिए उसे बहुत प्यार से पाला जाता है। और स्वार्थ पुरा होने पर उसे मार दिया जाता है।
मनुष्य की स्वार्थ की गतिविधियों को समझने के लिए बात कुछ आगे बढ़ाते हैं। अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए मनुष्य रेशम के कीड़े को कोकून अवस्था में ही कोकून को गर्म पानी में उबाल कर उसे मार देता है और रेशम प्राप्त करता है। अगर कोकून बड़ा हो जाए तो वह प्यूपा बनकर सेल को फाड़ कर बाहर निकलना चाहता है, जिससे रेशम के धागे नष्ट हो जायेंगे। इसलिए अपने स्वार्थ में रेशम का धागा सुरक्षित हासिल करने के लिए उसे गर्म पानी में उबाल कर कोकून अवस्था में ही मार दिया जाता है। यह है मनुष्य का स्वार्थ।
मनुष्य एक छोटे से जीव मधुमक्खी से उसका आहार मधु उसका छत्ता तहस नहस कर अपने स्वार्थ के लिए उससे छिन लेता है। यह भ्रम है कि मधुमक्खियाँ मधु दुसरे के लिए इकट्ठा करती हैं। वह भविष्य के लिए अपना खाना इकट्ठा करके अपने छत्ते में रखती हैं। वे फूलों से मीठा रस चुसकर पहले अपने पेट में रखती हैं। फिर अपने छत्ते में आकर वे एक दूसरे मधुमक्खी के मुंह में डालकर चबाती हैं, जिससे वह गाढ़े तरल पदार्थ में बदल जाता है। फिर उसे मुंह से उगल कर छत्ते में अपने पंखों से हवा कर उसे सुखाती हैं और इस प्रकार तैयार शहद को अपने छत्ते में इकत्रित कर चैंबरों में रख लेती हैं। लेकिन मनुष्य का नजर पड़ते ही वह तरह तरह का हथकंडा अपना कर मधुमक्खीयों को उनके छत्ते से भगा देता है और छत्ते को काटकर मधु इकत्रित कर लेता है।
ऐसा है मनुष्य का स्वार्थ, जो छोटे से छोटे जीव तक को भी नहीं बक्सता है। इतना ही नहीं वह अपने मतलब और सुख के लिए किसी छोटे जीव के मुंह से उगला हुआ चीज भी पहन लेता है और खा लेता है।
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