नवादा जिले की सांस्कृतिक विरासत
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास मगध के उत्कर्ष और विकास की गाथा है। मगध की इसी पावन और ऐतिहासिक कोख से जनमा एक अमूल्य रत्न है—नवादा। बिहार के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित नवादा जिला केवल एक प्रशासनिक इकाई मात्र नहीं है, बल्कि यह प्रागैतिहासिक काल, वैदिक सभ्यता, रामायण व महाभारत काल, मौर्य, शुंग, गुप्त, पाल राजवंशों और आधुनिक भारत के स्वतंत्रता संग्राम की जीवंत प्रयोगशाला रहा है।
प्रकृति ने जहाँ इसे महावर और रजौली जैसी अभेद्य पर्वत श्रृंखलाओं और ककोलत जैसे अमृत-तुल्य जलप्रपातों से नवाजा है, वहीं सनातन संस्कृति के विभिन्न पंथों—सौर, शाक्त, शैव, वैष्णव और ब्रह्म संस्कृतियों ने इसे अपनी साधना स्थली बनाया है। यह विस्तृत आलेख नवादा की उसी बहुरंगी विरासत का ३००० शब्दों में एक प्रामाणिक, ऐतिहासिक और संदर्भ-युक्त अन्वेषण है। नवादा के इतिहास की जड़ें इतिहास की पुस्तकों से भी आगे बढ़कर पुराणों के उस कालखंड तक जाती हैं जहाँ मानव सभ्यता की संरचना हो रही थी। वैदिक कालगणना और पौराणिक आख्यानों के अनुसार, नवादा का नामकरण और इसकी स्थापना सृष्टि के आरंभिक काल है।
भागवत पुराण और विष्णु पुराण के वंशानुक्रम के अनुसार, स्वायंभुव मनु एवं शतरूपा के वंश में राजा रिपु का जन्म हुआ, जिनकी पत्नी वृहती थीं। रिपु और वृहती के संसर्ग से 'चक्षुश' का जन्म हुआ। चक्षुश का विवाह प्रजापति विरन की पुत्री चपुष्करणी से हुआ, जिनसे चाक्षुष मनु (छठे मन्वंतर के अधिपति) उत्पन्न हुए।
चाक्षुष मनु का विवाह प्रजापति बैराज की पुत्री नड़बला से हुआ। नड़बला के गर्भ से १० प्रतापी पुत्रों का जन्म हुआ, जिनमें से एक अत्यंत पराक्रमी और तपस्वी पुत्र थे—कुत्स।।पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार, नड़बला के पुत्र कुत्स ने अपनी माता के सम्मान में अथवा तत्कालीन भौगोलिक संरचना के आधार पर इस क्षेत्र में 'नड़वा' नामक एक नगरी की स्थापना की थी। 'नड़वा' शब्द का प्राकृत और आंचलिक अपभ्रंश होते-होते मध्यकाल तक यह 'नवादा' के रूप में परिवर्तित हो गया। यह ऐतिहासिक संदर्भ सिद्ध करता है कि नवादा की भूमि का संबंध किसी नवीन आबादी से नहीं, बल्कि चाक्षुष मन्वंतर की प्राचीनतम मानव बस्तियों से है।
नवादा के प्राचीन गौरव को आधुनिक युग में प्रशासनिक पहचान मिलने में लंबा समय लगा। ब्रिटिश काल से लेकर स्वाधीन भारत के नव-निर्माण तक इसके प्रशासनिक स्वरूप में कई महत्वपूर्ण बदलाव आए।
ब्रिटिश काल और 'द एलियट मार्केट' १९वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में मगध का यह क्षेत्र गया जिले का हिस्सा हुआ करता था। ब्रिटिश हुकूमत ने इस क्षेत्र के व्यापारिक महत्व और प्रशासनिक नियंत्रण को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से वर्ष १८४५ में नवादा को एक अनुमंडल के रूप में स्थापित किया। उस दौर में यहाँ नील की खेती, अनाज व्यापार और पहाड़ी संपदा के कारण एक विशाल बाजार विकसित हुआ, जिसे तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारियों ने 'द एलियट मार्केट' नाम दिया था। स्वाधीनता के पश्चात, प्रशासनिक विकेंद्रीकरण और स्थानीय विकास को गति देने के लिए २६ जनवरी १९७३ को नवादा को गया से पूर्णतः अलग कर एक स्वतंत्र जिले का दर्जा प्रदान किया गया।
भौगोलिक दृष्टि से खुरी नदी ऐतिहासिक नगर की जीवनरेखा रही है। यह नदी शहर को दो स्पष्ट भागों में विभाजित करती है:।बाँया तट: यह पुराना शहर है, जहाँ प्राचीन सभ्यता की बसावट, तंग गलियाँ और पारंपरिक बाजार हैं।।दाँया तट: यह आधुनिक नवादा है, जहाँ वर्तमान प्रशासनिक भवन, कलेक्ट्रेट, न्यायालय और आधुनिक बस्तियाँ स्थित हैं।
नवादा की स्थलाकृति दक्षिण में छोटानागपुर के पठार के मिलन बिंदु पर स्थित है, जिसके कारण यह क्षेत्र पहाड़ों और घाटियों के एक सुरम्य जाल से घिरा है। पहाड़ों की ऊँचाई और उनका भौगोलिक दस्तावेजीकरण का नवादा जिले में स्थित पहाड़ों की श्रृंखला न केवल सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण रही है, बल्कि प्राचीन काल में यह तपस्वियों की कंदराएं भी थीं। इन पहाड़ों की आधिकारिक ऊँचाई का विवरण निम्नलिखित तालिका में स्पष्ट
१ महावर पहाड़ १८३२ फीट नवादा का उच्चतम शिखर, ककोलत का उद्गम स्थल।२ मुर्गारा पहाड़ १३४९ फीट रजौली रेंज की दुर्गम पहाड़ी श्रृंखला।३ थारी पहाड़ ११८९ फीट घने वनों से आच्छादित। ४ सतघरवा पहाड़ ११४५ फीट सात पहाड़ियों का समूह, प्राचीन गुफाओं के साक्ष्य। ५ लोहारवा पहाड़ १११४ फीट प्राचीन काल में लौह-अयस्क की उपलब्धता का केंद्र।।६ हरला पहाड़ १०३३ फीट औषधीय वनस्पतियों के लिए प्रसिद्ध।।७ चरकही पहाड़ १०१० फीट श्वेत पत्थरों की बहुलता। ८ सोंगा पहाड़ १००० फीट स्थानीय लोक-कथाओं से युक्त। ९ गिद्दा पहाड़ ९३८ फीट गिद्धों के प्राचीन प्राकृतिक वासस्थान। १० बाजारी पहाड़ १५९ फीट मैदानी क्षेत्र के निकट लघु पहाड़ी है। ककोलत जलप्रपात: ९० फीट का प्राकृतिक जल-अमृत है । महावर पहाड़ की १८३२ फीट की ऊँचाई से ९० फीट नीचे गिरने वाला ककोलत झरना मगध का गौरव है। यह जलप्रपात अपनी शीतल जलधारा और औषधीय गुणों के लिए पूरे भारत में विख्यात है। पहाड़ी वनस्पतियों को स्पर्श करता हुआ आने के कारण इसका जल अत्यंत पाचक और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है।
आंचलिक नदियाँ: जल-संस्कृति का आधार नवादा की भूमि को उर्वरता प्रदान करने वाली सदानीरा और मौसमी नदियों का अपना एक स्वतंत्र इतिहास है। पैमार, धनकर, तिलैया, धनंजरी, सकरी और खुरी नदियाँ इस क्षेत्र की कृषि और लोक-जीवन का आधार हैं। छोटानागपुर के पठार से निकलने वाली इन नदियों के रेतीले किनारों पर ही प्राचीन मानव बस्तियों का विकास हुआ था।
ऋषियों की तपोभूमि और पौराणिक मन्वंतर चेतना - नवादा का रजौली और कौआकोल का पर्वतीय अंचल वैदिक काल से ही ऋषियों की 'तपोभूमि' रहा है। वर्तमान वैवस्वत मनु के मन्वंतर में और आने वाले सावर्णि मन्वंतर की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि तैयार करने में इस क्षेत्र का योगदान अतुलनीय है। शृंग (श्रृंगी) ऋषि पहाड़: रजौली ब्लॉक के सघन वन क्षेत्र में स्थित यह पर्वत महर्षि शृंग की तपस्या का साक्षी है। पौराणिक इतिहास के अनुसार, त्रेतायुग में अयोध्या के राजा दशरथ को जब संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी, तब महर्षि शृंग ने ही उनका 'पुत्रेष्टि यज्ञ' संपन्न कराया था, जिसके फलस्वरूप भगवान श्री राम का अवतार हुआ। आज इस पहाड़ी के तलहटी में सुंदर फुलवरिया जलाशय स्थित है।।लोमश ऋषि पहाड़: नवादा और गया की सीमाओं को स्पर्श करती यह पहाड़ी महर्षि लोमश की साधना स्थली रही है। महाभारत काल में लोमश ऋषि ने ही पांडवों को विभिन्न तीर्थों की यात्रा कराई थी। मौर्य काल में बराबर और नागार्जुन की पहाड़ियों में इन्हीं के नाम पर 'लोमश ऋषि गुफा' का निर्माण किया गया था, जिसकी वास्तुकला नवादा के इस क्षेत्र से प्रेरित थी। ध्रुवा पहाड़ और दुर्वासा ऋषि: ध्रुवा पहाड़ का संबंध परम भक्त ध्रुव की निश्चल बाल-साधना से है। साथ ही, यह पर्वत महर्षि दुर्वासा के उग्र तप और उनके शिष्यों के निवास स्थान के रूप में भी पूजनीय है।।सप्तर्षि संस्कृति: रजौली की सात पहाड़ियों को 'सप्तर्षि' (कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज) का ध्यान केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि मन्वंतरों के संधिकाल में वेदों की ऋचाओं का गुप्त मनन इसी क्षेत्र में हुआ था।
वैवस्वत से सावर्णि मन्वंतर: सांस्कृतिक पंथों का महासमन्वय - नवादा केवल एक संप्रदाय की भूमि नहीं रही। यहाँ सनातन संस्कृति के पाँचों प्रमुख पंथों (पंचदेवोपासना) तथा प्रागैतिहासिक संस्कृतियों का अद्भुत सह-अस्तित्व देखने को मिलता है। सौर संस्कृति (सूर्य उपासना) - मगध का क्षेत्र आदिकाल से ही 'शाकद्विपीय' या 'मग' ब्राह्मणों का केंद्र रहा है, जिन्होंने भारत में मूर्तिमान सूर्य पूजा की शुरुआत की थी। नवादा के हिसुआ, नारदीगंज (हंडिया) और वारिसलीगंज में सूर्य उपासना की जड़ें अत्यंत गहरी हैं। यहाँ की सकरी और पैमार नदियों से प्राप्त पालकालीन काले पत्थरों की सूर्य मूर्तियाँ, जिनमें भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं, इस बात का प्रमाण हैं कि आधुनिक छठ व्रत की सांस्कृतिक निरंतरता इसी सौर संस्कृति का विस्तार है। शाक्त संस्कृति (शक्ति उपासना) - नवादा के आंचलिक क्षेत्रों में मातृ-देवी की पूजा प्राचीन काल से प्रभावी रही है। इसका सबसे बड़ा केंद्र चामुंडा स्थान है। पाल काल (८वीं से १२वीं शताब्दी) में यहाँ तांत्रिक और शाक्त संप्रदाय का भारी प्रभाव था। यहाँ से प्राप्त देवी चामुंडा, महिषासुरमर्दिनी और कालभैरवी की मूर्तियाँ लोक-रक्षा और दुष्टों के संहार की शाक्त चेतना को प्रदर्शित करती हैं। शैव संस्कृति (शिव साधना) - वैराग्य और लोक-कल्याण के प्रतीक भगवान शिव नवादा के जन-जन में रचे-बसे हैं। यहाँ पातालेश्वर महादेव के रूप में शिव की पूजा की जाती है। 'पातालेश्वर' उन शिवलिंगों को कहा जाता है जो भूमि के भीतर से स्वतः प्रादुर्भूत (प्रकट) होते हैं। यह उत्तर-गुप्त कालीन और मध्यकालीन शैव साधना का जीवंत केंद्र है, जहाँ सावन के महीने में लाखों श्रद्धालु जलाभिषेक करते हैं। वैष्णव संस्कृति (विष्णु उपासना) - नवादा की वैष्णव परंपरा का सबसे स्वर्णिम साक्ष्य अपसढ़ (Apsadh) से मिलता है। ७वीं शताब्दी में उत्तर-गुप्त वंश के शासकों ने यहाँ वैष्णव धर्म को राजकीय संरक्षण दिया। यहाँ से प्राप्त भगवान विष्णु के 'वराह अवतार' की विशालकाय पाषाण मूर्ति यह दर्शाती है कि समाज में संकट के समय रक्षा करने वाले भगवान के स्वरूप के प्रति कितनी अगाध श्रद्धा थी। ब्रह्म संस्कृति (ज्ञान एवं सृजन) - गया के पितृ-तीर्थ के निकट होने के कारण नवादा का क्षेत्र ब्रह्मा की मानस सृष्टि और वैदिक ज्ञान (ब्रह्म विद्या) के प्रसार का केंद्र रहा है। यहाँ के ऋषियों ने कर्मकांड से ऊपर उठकर उपनिषदों के ज्ञान मार्ग को प्रशस्त किया है।
मगध का इतिहास आर्य और आर्य-इतर संस्कृतियों के द्वंद्व और समन्वय का इतिहास है: नाग संस्कृति: रजौली और ककोलत के जलस्रोतों के पास नाग पूजा की प्राचीन परंपरा है। पाल काल में मानव चेहरे और नाग के धड़ वाली मूर्तियाँ यहाँ के पर्यावरण और नाग-वंश के प्रभाव को दर्शाती हैं। असुर व राक्षस संस्कृति: द्वापर युग में यह क्षेत्र मगध नरेश जरासंध के अधीन था, जो असुर संस्कृति का पोषक था। नवादा के पकरीबरावां और हिसुआ में महाभारत कालीन भीम और हिडिम्बा के लोक-संदर्भ मिलते हैं। इस संस्कृति का मुख्य अवदान धातुकर्म (Mining), गदा युद्ध की कला और भारी पत्थरों को बिना गारे के जोड़ने की वास्तुकला (Cyclopean Masonry) में था, जिसे बाद में मौर्यों ने अपनाया। नवादा का इतिहास भारत के बड़े साम्राज्यों के उत्थान, सैन्य अभियानों और कलात्मक प्रयोगों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा रहा है। मौर्य एवं शुंग काल (३२२ ई.पू. – ७३ ई.पू.) - मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र और उप-राजधानी राजगृह के अत्यंत निकट होने के कारण नवादा एक सामरिक गलियारा था। सम्राट अशोक और उनके पौत्र दशरथ ने नवादा की पहाड़ियों (जैसे सीतामढ़ी की चट्टानों) को काटकर तपस्वियों के लिए सुरक्षित स्थान बनाए। शुंग काल में यहाँ लोक-कला का उदय हुआ, जिसके तहत यक्ष और यक्षिणियों की विशाल मूर्तियाँ ग्राम-देवताओं के रूप में स्थापित की गई थी । नवादा के इतिहास का सबसे देदीप्यमान कालखंड उत्तर-गुप्त काल (६ठीं से ८वीं शताब्दी) है। इस काल में राजा आदित्यसेन ने नवादा के अपसढ़ को अपनी कलात्मक राजधानी बनाया। आदित्यसेन द्वारा यहाँ स्थापित कराया गया विष्णु मंदिर तत्कालीन भारत के सबसे ऊंचे और भव्य मंदिरों में से एक था। इस काल में मूर्तिकला अपनी शास्त्रीय पराकाष्ठा पर पहुँची।
हर्षवर्धन काल और चीनी यात्री ह्वेनसांग का आगमन है। ७वीं शताब्दी में जब सम्राट हर्षवर्धन का शासन था, तब चीनी बौद्ध भिक्षु और यात्री ह्वेनसांग ने मगध की यात्रा की थी। ह्वेनसांग ने वारिसलीगंज के निकट दरियापुर पार्वती का दौरा किया और अपने यात्रा वृत्तांत 'सी-यू-की' में यहाँ स्थित 'कपोतिका बौद्ध विहार' का अत्यंत विस्तृत विवरण दिया। उन्होंने लिखा कि यह क्षेत्र बौद्ध धर्म की महायान शाखा और हिंदू दर्शन के शास्त्रार्थ का एक बड़ा केंद्र था। पाल काल (७५० ई. – ११७४ ई.) - पाल राजाओं (धर्मपाल और देवपाल) के समय नवादा मूर्तिकला के एक अंतरराष्ट्रीय स्कूल (Kurkihar-Nawada Style) के रूप में विकसित हुआ। इस काल की सबसे बड़ी विशेषता काले बेसाल्ट पत्थर (Black Basalt Stone) का उपयोग था। आज भी नवादा की नदियों की खुदाई या तालाबों के जीर्णोद्धार के समय पालकालीन बुद्ध, विष्णु और सूर्य की अत्यंत चिकनी, चमकदार और सजीव मूर्तियाँ प्राप्त होती हैं।
नवादा की साम्राज्यवार कला एवं संस्कृति यात्रा का मौर्य काल में रॉक-कट गुफाएं और चमकीली पॉलिश (सीतामढ़ी) , गुप्त काल में वैष्णव पुनरुत्थान, भव्य पाषाण मंदिर (अपसढ़), हर्षवर्धन काल में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शिक्षा केंद्र (दरियापुर पार्वती) , पाल काल में काले बेसाल्ट पत्थर की तांत्रिक व शांत मूर्तियाँ है। मुगल काल: सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक, राजा टोडरमल ने जब संपूर्ण भारत का भूमि राजस्व सर्वेक्षण (Bandobast) किया, तो नवादा को 'बिहार सुबा' के एक प्रमुख महाल के रूप में दर्ज किया, जिससे इसके कृषि राजस्व की महत्ता सिद्ध होती है। ब्रिटिश काल: १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में नवादा अछूता नहीं रहा। यहाँ के स्थानीय किसानों और छोटे जमींदारों ने गया के विद्रोहियों के साथ मिलकर ब्रिटिश खजाने को लूटा और कुछ समय के लिए ब्रिटिश हुकूमत के पैर उखाड़ दिए थे । सर्वोदय आंदोलन: आधुनिक भारत के निर्माण में नवादा का कौआकोल क्षेत्र एक तीर्थ के समान है। १९५२ में लोकनायक जयप्रकाश नारायण (JP) ने यहाँ के सोखोदेवरा में 'सर्वोदय आश्रम' की स्थापना की थी। इस आश्रम का उद्घाटन भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने किया था। इससे पूर्व, १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब जेपी हज़ारीबाग जेल से भागे थे, तो उन्होंने कौआकोल की दुर्गम पहाड़ियों में स्थित 'जेपी रॉक' पर शरण ली थी और यहीं से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ 'आज़ाद दस्ते' का गुरिल्ला युद्ध संचालित किया था।
नवादा की धरती पर बिखरे पुरातात्विक स्थल प्राचीन इतिहास के जीवंत दस्तावेज हैं। अपसढ़ - उत्तर-गुप्त कालीन कला का उद्गम। है। वारिसलीगंज प्रखंड में स्थित अपसढ़ उत्तर-गुप्त काल का सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। विशाल विष्णु मंदिर और शिलालेख: यहाँ राजा आदित्यसेन का प्रसिद्ध पाषाण शिलालेख मिला है। यहाँ एक विशाल ईंटों से निर्मित मंदिर का टीला है, जो कभी बहुमंजिला था। रामायण कालीन टेराकोटा पट्टिकाएं: इस मंदिर के चारों ओर मिट्टी की पट्टिकाएं (Terracotta panels) लगी थीं, जिन पर रामायण के दृश्य उकेरे गए थे। इनमें श्री राम, लक्ष्मण और सीता का केवट की नाव पर बैठकर गंगा पार करना, भरत मिलाप और वनवास के दृश्य शामिल हैं। यह भारत में रामायण के दृश्यांकन का सबसे प्राचीन पुरातात्विक साक्ष्य है।
आपसड - वराह अवतार मूर्ति: यहाँ से प्राप्त एकाश्म (Single stone) काले पत्थर की विशाल वराह मूर्ति मूर्तिकला का अद्भुत उदाहरण है, जिसके शरीर पर देवताओं की सूक्ष्म आकृतियाँ उकेरी गई हैं।
दरियापुर पार्वती: वारिसलीगंज के पास स्थित इस पहाड़ी टीले का ऐतिहासिक महत्व अद्वितीय है: इंद्रशाल गुफा : बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, इस पहाड़ी पर वह 'इंद्रशाल गुफा' स्थित थी जहाँ भगवान बुद्ध ने ध्यान लगाया था और स्वयं देवराज इंद्र ने उनसे आकर ४२ गूढ़ दार्शनिक प्रश्न पूछे थे। : यहाँ से भारी मात्रा में बौद्ध अवलोकितेश्वर, तारा और हिंदू देवी-देवताओं की खंडित प्रतिमाएं मिली हैं, जो इसके एक समय महान धार्मिक-शैक्षणिक केंद्र होने की पुष्टि करती हैं। सीतामढ़ी - नवादा के मेसकौर प्रखंड में स्थित सीतामढ़ी एक अत्यंत दर्शनीय पुरातात्विक स्थल है। यहाँ एक विशाल पृथक ग्रेनाइट चट्टान को काटकर एक कृत्रिम गुफा बनाई गई है।इस गुफा की अंदरूनी दीवारें इतनी चिकनी हैं कि उन पर मौर्यकालीन प्रसिद्ध ओपदार चमक आज भी देखी जा सकती है। माता सीता ने वनवास के उत्तरार्ध में यहीं आश्रय लिया था और लव-कुश का जन्म यहीं हुआ था। गुफा के भीतर माता सीता और लव-कुश के चरण चिह्न और प्राचीन मूर्तियाँ पूजित हैं। हंडिया : नारदीगंज प्रखंड के हंडियागाँव में स्थित यह स्थल पूर्णतः महाभारत कालीन इतिहास से ओतप्रोत है।।सूर्य मंदिर और कुष्ठ-मुक्ति कुंड: यहाँ एक प्राचीन सूर्य नारायण मंदिर है जिसके समीप एक विशाल कुंड (तालाब) स्थित है। मगध सम्राट जरासंध की पुत्री कुष्ठ रोग से पीड़ित थी। इस कुंड के जल में स्नान करने और सूर्य देव की आराधना करने से उनका कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक हो गया था। आज भी रविवार के दिन और विशेषकर छठ व्रत के अवसर पर यहाँ हजारों श्रद्धालु आते हैं, और यह मान्यता है कि इस कुंड के जल में औषधीय और आध्यात्मिक तत्व विद्यमान हैं जो चर्म रोगों से मुक्ति देते हैं।
बोलता पहाड़ - नवादा के कौआकोल और सोखोदेवरा की पहाड़ी श्रृंखलाओं में एक विशिष्ट प्राकृतिक स्थान है जिसे स्थानीय लोग 'बोलता पहाड़' कहते हैं। इसकी भौगोलिक बनावट इस प्रकार की है कि जब कोई व्यक्ति एक निश्चित टीले या घाटी में खड़े होकर ऊंचे स्वर में कोई शब्द बोलता है, तो पहाड़ की चट्टानों से टकराकर वह ध्वनि तरंगें हूबहू और स्पष्ट रूप से वापस गूंजती (Echo) हैं। प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा मंत्रोच्चार के समय ध्वनि के इस परावर्तन का उपयोग मानसिक शांति और नाद-योग के लिए किया जाता था।
आंचलिक स्थल: पातालेश्वर, चामुंडा, हिसुआ, वजीरगंज, पकरीबरावां - पातालेश्वर: भूमिगत शिव चेतना का केंद्र, जहाँ गुप्तकालीन स्थापत्य के भग्नावशेष मिलते हैं। चामुंडा स्थान: ग्रामीण अंचलों में स्थापित तांत्रिक साधना की पीठ। हिसुआ और वजीरगंज: प्राचीन काल में राजगीर, बोधगया और पाटलिपुत्र को जोड़ने वाले मुख्य व्यापारिक राजमार्ग (Trade Routes) थे, जहाँ मौर्य और गुप्त काल की सेनाएं पड़ाव डालती थीं। यहाँ आज भी प्राचीन सराय और सुरक्षा चौकियों के अवशेष टीलों के रूप में विद्यमान हैं।पकरीबरावां: महाभारत कालीन लोक-संस्कृति, लोक-गाथाओं (जैसे लोरिकायन) और प्राचीन कृषि व्यवस्था का एक ऐतिहासिक केंद्र है।
स्वायंभुव और चाक्षुष मनु के पौराणिक काल से लेकर, ऋषियों की वैदिक साधना, मौर्यों के सामरिक वैभव, उत्तर-गुप्त राजा आदित्यसेन की कला-साधना, पाल राजाओं की बेसाल्ट मूर्तिकला और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सर्वोदय सिद्धांतों तक—नवादा का इतिहास भारतीय सभ्यता का एक अटूट और जीवंत प्रवाह है।
नवादा की यह पावन भूमि चीख-चीख कर कहती है कि इतिहास केवल राजधानियों (पाटलिपुत्र या दिल्ली) में नहीं बनता, बल्कि उसकी असली आत्मा अपसढ़ की मिट्टी की पट्टिकाओं में, ककोलत के गिरते पानी में, हंडिया के सूर्य कुंड में और सीतामढ़ी की मौर्यकालीन चमकीली गुफाओं में बसती है। इस अमूल्य विरासत का संरक्षण, पुरातात्विक उत्खनन और इसे वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करना न केवल नवादा बल्कि संपूर्ण भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को अक्षुण्ण रखने के लिए अनिवार्य है। नवादा वास्तव में मगध के गौरवशाली मुकुट का एक ऐसा अनुपम हीरा है जिसकी चमक अनंत काल तक फीकी नहीं पड़ सकती।
संदर्भ सूची।१. विष्णु पुराण एवं भागवत पुराण: चाक्षुष मनु, नड़बला और कुत्स के वंशवृत्त का पौराणिक संदर्भ।
२. ह्वेनसांग का यात्रा वृत्तांत (सी-यू-की): दरियापुर पार्वती और कपोतिका बौद्ध विहार का ऐतिहासिक विवरण।
३. अपसढ़ पाषाण शिलालेख (उत्तर-गुप्त काल): राजा आदित्यसेन का शासनकाल, वराह मूर्ति और विष्णु मंदिर के पुरातात्विक साक्ष्य। ४. गया जिला गजेटियर (ब्रिटिश काल, १८४५ व १९०६ 1057 ): नवादा अनुमंडल की स्थापना और 'द एलियट मार्केट' का प्रशासनिक दस्तावेजीकरण। ५. सर्वोदय आंदोलन के ऐतिहासिक दस्तावेज (१९५२): सोखोदेवरा आश्रम की स्थापना और लोकनायक जयप्रकाश नारायण का राष्ट्रीय आंदोलन में अवदान , मगध क्षेत्र की विरासत ।
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