प्रेम सुधा की ज्योति जले, हर पल रस की धार बहे
कुमार महेंद्रतुम्हारी आँखों के दर्पण में,
मेरा जीवन मुस्काता है।
साँसों की मादक सुरभि से,
मन-उपवन पुलकित हो जाता है।
जब से मिला तुम्हारा सान्निध्य,
अंतर प्रेम-तरंग रहे।
प्रेम सुधा की ज्योति जले, हर पल रस की धार बहे।।
अधरों पर मधुमय हास सजा,
नयनों में अनुराग खिला।
चाहत के कोमल स्पर्शों से,
प्रणय का नव उत्सव मिला।
तुम सुर हो मेरे गीतों के,
शब्द-शब्द मधुगंध बहे।
प्रेम सुधा की ज्योति जले, हर पल रस की धार बहे।।
तारों की मद्धिम छाँव तले,
जब तुम समीप चले आते हो।
स्पर्श तुम्हारा पाकर प्रिय,
मन में शत दीप जलाते हो।
हृदय-वीणा के कोमल स्वर,
तेरा ही मंगल गान कहे।
प्रेम सुधा की ज्योति जले, हर पल रस की धार बहे।।
संसार की सुध-बुध विस्मृत कर,
अष्ट प्रहर तेरा ध्यान धरूँ।
युगों से संजोए स्वप्नों को,
अब साकार रूप में निहारूँ।
साँसों की पावन माला में,
स्मृतियों के सुमन सदा गुँथे ।
प्रेम सुधा की ज्योति जले, हर पल रस की धार बहे।।
चंदन-सी शीतल स्मृतियों में,
तेरा रूप उजास बिखेरे।
मन-मंदिर के पावन दीप,
तेरे नाम का प्रकाश घेरे।
जीवन की हर साँझ-सवेरे,
नेह-सुधा की सरगम रहे।
प्रेम सुधा की ज्योति जले, हर पल रस की धार बहे।।
कुमार महेंद्र(स्वरचित मौलिक रचना)
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