कभी-कभी प्रेम शब्दों से नहीं, मौन से बोलता है…जब प्रिय की स्मृतियाँ ही जीवन का संगीत बन जाएँ, तब हृदय की पीड़ा भी आराधना प्रतीत होती है। प्रस्तुत है मेरी नवीन स्वरचित विरह-श्रृंगार रचना ।
कैसे लिखूं मैं प्रेमिल हृदय की पीर
कुमार महेंद्रदृष्टिगोचर प्रियतम छवि से,
विस्मृत हुआ स्व-अस्तित्व।
कण-कण अंतर प्रिय-दर्शनमय,
मिलन बना एकमात्र कृतित्व।
जग की चकाचौंध व्यर्थ लगे,
प्रणय बना रांझा-हीर।
कैसे लिखूं मैं प्रेमिल हृदय की पीर।।
प्रेम परम अनुभूति अलौकिक,
वेदना संग चाह अनंत।
त्याग दी जग की रीति-नीति,
मन हो गया मानो संत।
आलोचना निष्प्रभ प्रतीत हो,
चितवन प्रिय स्मृति-तीर।
कैसे लिखूं मैं प्रेमिल हृदय की पीर।।
उर में अंकित अनुपम छवि,
राधा-कृष्ण सा भाव।
मीरा जैसी आराधना में,
बहता नेह-प्रवाह।
वियोग तन तक सीमित केवल,
नयन बहाते नेह-नीर।
कैसे लिखूं मैं प्रेमिल हृदय की पीर।।
शब्द स्वर सब मौन हो गए,
हृदय करता केवल पुकार।
प्रियतम ही वाणी का पर्याय,
सादगी सोलह श्रृंगार।
अष्टप्रहर प्रिय-चिंतन में,
मन हो जाता अति अधीर।
कैसे लिखूं मैं प्रेमिल हृदय की पीर।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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