"कर्म का उत्सव"
पंकज शर्मा
प्रिय मित्रों महानता किसी उपलब्धि का आकस्मिक वरदान नहीं, बल्कि उस साधना का परिणाम है जिसमें कर्म एवं प्रेम का अद्वैत स्थापित हो जाता है। जब मनुष्य अपने कार्य को केवल उत्तरदायित्व समझकर नहीं, अपितु अपने अंतःकरण की स्वाभाविक अभिव्यक्ति मानकर करता है, तब उसका प्रत्येक प्रयास सृजन की गरिमा से आलोकित हो उठता है। अनुराग से संपन्न कर्म ही साधारण को असाधारण बनाने की क्षमता रखता है।
कर्म के प्रति प्रेम मनुष्य को बाह्य पुरस्कारों की सीमाओं से ऊपर उठाकर आत्मतोष की अनुभूति प्रदान करता है। तब श्रम बोझ नहीं, आत्मा का उत्सव बन जाता है एवं जीवन का प्रत्येक क्षण अर्थवत्ता से भर उठता है। जो व्यक्ति अपने कार्य में अपने अस्तित्व का प्रतिबिंब देख लेता है, वही उत्कृष्टता के शिखरों को स्पर्श करता है एवं अपने जीवन को प्रेरणा का शाश्वत स्रोत बना देता है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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