राजधर्म : मनुस्मृति और भारतीय संविधान, भाग - 21 ख
संविधान राजनीतिज्ञों की आचार संहिता
डॉ राकेश कुमार आर्य
यह तब है जब हम सब यह भली प्रकार जानते हैं कि संविधान राजनीतिज्ञों की आचार संहिता भी होता है। अतः वह अपने राजनीतिक लोगों के लिए उनका राजधर्म भी घोषित करे। जब संविधान द्वारा कोई राजधर्म ही घोषित नहीं होगा तो राजनीतिक लोगों के द्वारा धर्मविहीन राजनीति करना अर्थात धर्मनिरपेक्ष होकर नीतियों का निर्धारण करना निश्चित है और यही भारत में हो रहा है। इसलिए संविधान के किसी प्राविधान या अनुच्छेद में भारत के किसी राजधर्म की घोषणा न होना भारत का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है । वेद ने शासक वर्ग के कर्त्तव्यों को 'राजधर्म' मानते हुए घोषणा की है-
ओ३म् रक्षा माकिर्नो अधशंस ईशत मानो दुशंस ईशत ।
मा नो अद्य गवां स्तेनो मावीनां वृक ईशत ।।(अथर्ववेद)
भावार्थ :- ' ऐसा कोई भी दुष्ट दुराचारी, अन्यायकारी व्यक्ति हमारा शासक नहीं हो सकता जो हमारी वाणी पर प्रतिबंध लगाने वाला हो अर्थात हमारी ज़ुबान पर ताले लगाता हो, बोलने से रोकता हो अर्थात भाषण और अभिव्यक्ति की हमारी मौलिक स्वतंत्रता को बाधित करता हो। हम पर वही व्यक्ति शासन कर सकता है जो भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करने वाला हो। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाए रखने का अभिप्राय है कि वैज्ञानिक उन्नति निरंतर होती रहे। रूढ़िवाद पर यदि प्रहार किया जा रहा हो तो ऐसे लोगों को राजा रोके नहीं अपितु वैज्ञानिक उन्नति के लिए उन्हें बोलने की अनुमति दे। हम किसानों से हमारी भूमि छीनने वाला तथा हम पशु पालकों से हमारी गौ आदि पशु छीनने वाला व्यक्ति अर्थात ऐसा व्यक्ति जो व्यक्तियों की आजीविका के साधनों का हनन करने वाला हो, हमारा शासक न बने। हे ईश्वर ! हमारी ऐसी प्रार्थना को सुनकर आप हमारी रक्षा करें।'
इस मंत्र का अभिप्राय है कि जो व्यक्ति लोगों को बोलने से रोक कर अपनी तानाशाही दिखाए, अधिनायकवादी आचरण करे,वह देश का राजा नहीं हो सकता। वह व्यक्ति भी हमारा राजा नहीं हो सकता जो लोगों की आजीविका के साधनों को छीनकर अपना साम्राज्य विस्तार करे अर्थात स्वयं तो पूंजी का संचयन करे परंतु लोगों का शोषण करे या और लोगों को पूंजी रखने से रोके, बड़े-बड़े कॉलोनाइजर्स या शहर बसाने वाली कंपनियों के साथ चोरी छुपे अपने परिवार के लिए धन कमाए और अपने खास लोगों को फूलने फलने का अवसर प्रदान करे।
इंदिरा गांधी का अधिनायकवाद
जब इंदिरा गांधी को देश के इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनाव में अनुच्छेद साधनों का प्रयोग करने का दोषी पाया और उनके चुनाव लड़ने पर अगले 6 वर्ष के लिए प्रतिबंध लगा दिया तो उन्होंने बौखलाहट में देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों को स्थगित कर सारी सत्ता अपने हाथों में ले ली। देश में आपातकाल लगा दिया गया। बड़ी संख्या में लोगों को जेल में डाला गया। अनेक पत्रकारों ,राजनीतिक लोगों, बुद्धिजीवियों, लेखकों आदि को जेलों में डाल दिया गया। जो संविधान अभी मुश्किल से 25 वर्ष ही पूर्ण कर पाया था, उसी ने लोकतंत्र की हत्या कर दी।
उस घटना पर यह सोचने की आवश्यकता थी कि कमी संविधान के प्राविधानों में थी या फिर संविधान को लागू करने वालों की सोच में कहीं कमी थी ? देश के लोगों ने इंदिरा गांधी को 1980 के चुनाव में सत्ता से बाहर कर दिया और सत्ता की चाबी जनता पार्टी के हाथों में सौंप दी। तब जनता पार्टी को भी यह अवलोकन करना चाहिए था कि लोकतंत्र में संविधान की हत्या का पाप कैसे हो गया ? और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं ?
यद्यपि जनता पार्टी ने इस ओर थोड़ा ध्यान दिया, परंतु वह भी इसका सटीक उपचार नहीं कर पाई। क्योंकि आगे चलकर इसी संविधान के प्राविधानों के अंतर्गत सत्ता में आई जनता पार्टी की सरकार को उसी कांग्रेस ने गिरा दिया जिसने कुछ समय पहले देश में आपातकाल लगाया था। यानी 1975 में देश में आपातकाल लगाकर देश के संविधान की हत्या करने वाली कांग्रेस ने चुनी हुई सरकार को सिरों की गिनती के खेल में पछाड़कर उसे सत्ता से चलता कर दिया। इतने पर भी उसकी बात बनी नहीं। अपने आप को सत्ता के बीच में लाने के लिए हवा से हवा में मार करते हुए कांग्रेस ने जनता पार्टी की सरकार के बाद आई चरण सिंह सरकार को हवा में ही उड़ा दिया, यानी एक बार फिर संविधान की हत्या की गई।
सिरों की गिनती के इस खेल में अनैतिक और अधर्मी बनी राजनीति ने इसी प्रकार कई सरकारों को गिराया। जिनमें वी पी सिंह की सरकार, चंद्रशेखर की सरकार, एच.डी. देवेगौड़ा की सरकार, इंद्र कुमार गुजरात की सरकार, अटल बिहारी वाजपेई की सरकार जैसी कई सरकारों के नाम सम्मिलित हैं।
देश की संसद बन गई हस्तिनापुर की राज्यसभा
कहने के लिए तो यह सब कुछ संवैधानिक था, परंतु यदि मनुस्मृति के दृष्टिकोण से तो यह सारा का सारा खेल अनीति और अधर्म को बढ़ावा देने वाला था। वास्तव में यह हस्तिनापुर की राज्यसभा में खेले जाने वाले जुआ के खेल जैसा ही था। इन घटनाओं में हमने राजनीति के अनेक 'दुर्योधनों 'को लोकतंत्र की दुल्हन का शीलभंग करते हुए देखा था। देश की राज्यसभा या संसद में बैठकर सबने लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास किया और बड़ी ढीठता और निर्ममता से लोकतंत्र की हत्या की। न तो किसी गुरु द्रोणाचार्य की सुनी, न ही किसी कृपाचार्य की सुनी, न भीष्म पितामह की सुनी और न ही किसी विदुर की सुनी। राजधर्म से हीन संविधान ने अधर्मी राजनीति और धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं के माध्यम से बड़ी खूबसूरती के साथ लोकतंत्र की हत्या की और उसे हत्या के रूप में न तो प्रचारित होने दिया और न ही कहीं उल्लेखित होने दिया।
जब सत्ता को नोंच-नोंचकर खाने वाले गिद्ध राज्यसभा में पहुंचकर इस प्रकार का आचरण करते हैं तो उससे न केवल लोकतंत्र की हत्या होती है, अपितु देश के नागरिकों को भी अनेक प्रकार के कष्ट झेलने पड़ते हैं। 'शतपथ ब्राह्मण' में आया है-
'यदि राजवर्ग पर प्रजा का नियंत्रण न रहे तो राजवर्ग प्रजा का ऐसे नाश कर देता है जैसे जंगल में शेर सभी हृष्ट-पुष्ट पशुओं को मारकर खा जाता है। इसलिए किसी एक को स्वतन्त्र शासन का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।'
इसका अभिप्राय है कि शासन में बैठे लोगों को कभी भी निरंकुश नहीं होना चाहिए। इसके लिए शासन व्यवस्था, शासन तंत्र और देश का संविधान इतना मजबूत होना चाहिए कि वह किसी भी व्यक्ति को कभी तानाशाह न बनने दे।
गीता में श्री कृष्ण जी कहते हैं :-
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तद्नुवर्त्तते ।।
अर्थात- समाज के गणमान्य और प्रतिष्ठित व्यक्ति जैसा व्यवहार करते हैं अर्थात शासन प्रशासन में बैठे लोग जिस प्रकार का आचरण व्यवहार करते हैं, आमजन भी उसी प्रकार का आचरण करते हैं। जैसा राजा होता है, वैसी प्रजा हो जाती है।
राजधर्म का उद्घोषक हो संविधान
" भारतीय संविधान के कुछ आपत्तिजनक अनुच्छेद " ना अपनी पुस्तक में हमने लिखा है कि "यदि सदाचार का व्यवहार हमारे जन-प्रतिनिधि करेंगे तो जनता उनका अनुसरण अवश्य करेगी। मानवीय व्यवहार के इस 'सच' को हमारे संविधान को मान्यता प्रदान करनी चाहिए। तत्संबंधी संसदीय नियमावली अथवा अन्य कोई विधिक व्यवस्था उपयुक्त नहीं है। इस विषय में हमारे संविधान को ही स्पष्ट प्राविधान करना पड़ेगा। क्योंकि संविधान हमारे राजधर्म की नियमावली है। राजधर्म का स्पष्ट उद्घोषक, संस्थापक और व्यवस्थापक संविधान को ही होना चाहिए। राजनीति का पथप्रदर्शक संविधान को ही बनना चाहिए। यदि राजनीति का पथ प्रदर्शक संविधान नहीं बन सकता तो उसका अस्तित्व नगण्य है। धर्म इस का प्ररेणास्त्रोत बनना चाहिए और 'सुराज' इसका अन्तिम ध्येय बनना चाहिए। 'लोककल्याणकारी' राज्य की स्थापना लोक कल्याण की भावना से प्रेरित जनप्रतिनिधियों के चयन से ही सम्भव है। लोक कल्याण शासन का अन्तिम उद्देश्य होता है।"
लोकतन्त्र का इस प्रकार अपहरण किया गया है कि सारी व्यवस्था ही चरमरा गयी है। विधायक और सांसद विधानसभाओं में तथा संसद में 'रबर-स्टाम्प' बने बैठे हैं। उनका नेता जैसे चाहे, जब चाहे, जहाँ चाहे उनका उपयोग कर सकता है। मनुस्मृति में आया है-
यत्र धर्मोहि अधर्मेण सत्यं यत्र अनृतेन च ।
हन्यते प्रेक्षमाणानो हतरस्तत्र सभासदः ॥
अर्थात जिस सभा में अधर्म से धर्म यानि अन्याय से न्याय और असत्य से सत्य सब सभासदों के देखते हुए मारा जाता है, उस सभा में सब मुर्दे के समान हैं।' इसलिए हमारे विधायकों व सांसदों के लिए भी यह अनिवार्य व्यवस्था की जानी चाहिए कि वे न्यायसंगत पक्ष पर अपने विचार अवश्य रखें। पार्टी व्हिप' का अंकुश उन पर नहीं लटकना चाहिए। 'पार्टी व्हिप' को लोकतन्त्र के विरुद्ध माना जाना चाहिए।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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