राजा राजपुरुष और न्यायाधीश के लिए दंड का निर्धारण, भाग - 20 क
भारत के संविधान के अनुच्छेद 124 में उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन सम्बन्धी प्रावधान किया गया है। अनुच्छेद 124 ( क ) के अंतर्गत राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग और ( ख) के अंतर्गत आयोग के कृत्य, 124( ग ) के अंतर्गत विधि बनाने की संसद की शक्ति को स्पष्ट किया गया है। अनुच्छेद 125 के अंतर्गत न्यायाधीशों के वेतन आदि, अनुच्छेद 126 के अंतर्गत कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति, 127 के अंतर्गत तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति, अनुच्छेद 128 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति, अनुच्छेद 129 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना, 130 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का स्थान, 131 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता, 131 ( क ) निरसित, 132 कुछ मामलों में उच्च न्यायालय से अपीलों में उच्चतम न्यायालय की अपीलीय अधिकारिता,133 के अंतर्गत उच्च न्यायालय से सिविल विषयों से संबंधित अपीलों में उच्चतम न्यायालय की अपीलीय अधिकारिता,अनुच्छेद 134 के अंतर्गत दांडिक विषयों में उच्चतम न्यायालय की अपीलीय अधिकारिता ,
134( क ) उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए प्रमाण पत्र, 135 के अंतर्गत विद्यमान विधि के अधीन फेडरल न्यायालय की अधिकारिता और शक्तियों का उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रयोग होना , 136 के अंतर्गत अपील के लिए उच्चतम न्यायालय की विशेष अनुमति, अनुच्छेद 137 के अंतर्गत निर्णयों या आदेशों का उच्चतम न्यायालय द्वारा पुनर्विलोकन, 138 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता की वृद्धि, 139 के अंतर्गत कुछ रिट निकालने की शक्तियों का उच्चतम न्यायालय को प्रदत्त किया जाना, 139 ( क ) कुछ मामलों का अंतरण, 140 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की शक्तियां, 141 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि का सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होना, 142 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की डिग्रियां और आदेशों का प्रवर्तन और प्रकटीकरण आदि के बारे में आदेश, 143 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति, 144 के अंतर्गत सिविल और न्यायिक प्राधिकारियों द्वारा उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य किया जाना, 145 न्यायालय के नियम आदि ,146 उच्चतम न्यायालय के अधिकारी और सेवक तथा व्यय, 147 के अंतर्गत निर्वचन का प्रावधान किया गया है। राज्यों के उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालयों के बारे में अनुच्छेद 214 से लेकर 237 तक प्रावधान किया गया है।
इन अनुच्छेदों को देखने से लगता है कि जैसे बहुत सूक्ष्मता से एक-एक बिंदु पर विचार किया गया है और एक-एक बात को स्पष्ट किया गया है। परंतु इन सभी अनुच्छेदों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इनमें कहीं पर भी यह उल्लेख नहीं किया गया है कि यदि न्यायाधीश अपराध करते हैं तो उनके विरुद्ध क्या कार्यवाही होगी अथवा उन्हें कितने अनुपात में दंड दिया जाएगा और यदि न्यायाधीश रिश्वत लेकर न्याय करते पाए जाते हैं तो उनके विरुद्ध किस प्रकार की कार्यवाही की जाएगी और उन्हें कितना दंड दिया जाएगा ? न्याय देने वाले ही यदि अन्याय करते हैं, न्याय देने में अत्यधिक विलंब करते हैं तो उनके इस प्रकार के आचरण को क्या माना जाएगा ?
मनु के धर्मशास्त्र की विशेषता
इसके विपरीत मनु महाराज ने अपने धर्मशास्त्र में मानवता के हित में संक्षेप में बड़ी बातों को कहने का प्रयास किया है। उनके श्लोकों में बड़ी बात को संक्षेप में कहने की असीम क्षमता है। उन्होंने मनुस्मृति में स्पष्ट व्यवस्थाएं की हैं कि यदि राजा ,राजपुरुष और न्यायाधीश अपराध करते पाए जाते हैं तो उनके विरुद्ध क्या कार्यवाही होगी अथवा उन्हें कितने अनुपात में दंड दिया जाएगा ? इस प्रकार की व्यवस्थाएं ही वास्तव में मनु के धर्मशास्त्र की ऐसी विशेषताएं हैं जो संसार के किसी अन्य संविधान में मिलनी संभव हैं।
पंचायत के बारे में जहां भारतीय संविधान में अनुच्छेद 243 में व्यवस्था की गई है, वहीं इस अनुच्छेद को 47 उप अनुच्छेदों में विभाजित कर दिया गया है। जिनमें पंचायत के अतिरिक्त नगरपालिकाओं और सहकारी सोसाइटियों के बारे में भी प्रावधान किया गया है।
कानून और मानव - मन
आज जबकि शासन प्रशासन में भ्रष्टाचार चरम पर है और मनुष्य का काइयांपन कदम - कदम पर मर्यादाओं और विधिक प्रावधानों की धज्जियां उड़ाता हुआ दिखाई देता है, तब छोटी बात को विभिन्न अनुच्छेदों के माध्यम से स्पष्ट करना मानव मन की भ्रष्टाचारी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की एक कवायद मात्र हैं। व्यक्ति को आप कभी कानून से नियंत्रित नहीं कर सकते। यदि मनुष्य को कानून से रोकने का प्रयास किया गया तो वह और भी अधिक अपराधी बनता चला जाएगा। उसका उपद्रवी मन उसे कानून तोड़ने के लिए अथवा कानून से बच निकलने के लिए नए-नए उपाय सुझाता रहेगा और वह उन पर काम करता जाएगा।
कानून से मनुष्य को रोकने का प्रयास वैसा ही है, जैसे नदी में पीछे से निरंतर पानी को आने देते रहकर भी उसे किसी मिट्टी के बांध से रोकने का प्रयास किया जाए। नदी में बाढ़ न आए अथवा नदी का पानी कहीं विनाशलीला न मचाये, इसके लिए आवश्यक है कि या तो पीछे से आने वाले पानी के प्रवाह को रोक दिया जाए या उसके प्रवाह को बदल दिया जाए। मानव मन की भ्रष्टाचारी प्रवृत्तियों पर तभी अंकुश लगाया जा सकता है जब उन्हें शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी दिए जाएं। इन सारे प्रावधानों में संविधान कानून की बारीकियों में तो जाता हुआ दिखाई देता है, परंतु मानव मन की बारीकियों में जाता हुआ दिखाई नहीं देता। इसलिए ऐसा लगता है कि जैसे संविधान बाढ़ से बचने के लिए बांध तो बना रहा है, परंतु पीछे से आने वाले पानी को रोकने का उसके पास कोई उपाय नहीं है।
अनुसूचित क्षेत्र की व्यवस्था
अनुच्छेद 244 में अनुसूचित क्षेत्रों और जनजाति क्षेत्र के प्रशासन संबंधी प्राविधानों को दिया गया है। 244 ( क ) में असम के कुछ जनजातीय क्षेत्रों को समाविष्ट करने वाला प्राविधान दिया गया है। संघ और राज्यों के बीच संबंधों को स्पष्ट करने वाले प्राविधान अनुच्छेद 245 से लेकर 255 में स्थापित किए गए हैं।
जहां तक अनुसूचित क्षेत्र / जनजाति क्षेत्र के प्रशासन का संबंध है तो यह मनुस्मृति में कहीं पर भी नहीं दिया गया है। इसका कारण यह है कि उस समय इस प्रकार के प्रशासन की आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि अनुसूचित क्षेत्र और अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति क्षेत्र उस समय नहीं थे। न ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे शब्दों का प्रयोग किसी वर्ग विशेष के लिए किया जाता था।
जाति अथवा वर्गों के आधार पर पिछड़ापन मनु महाराज के समय की नहीं, उसके पश्चात वैदिक संस्कृति के पतन के काल की देन है। अनुच्छेद 262 में अंतर्राज्यीय नदियों या नदी जल संबंधी विवादों के न्यायनिर्णयन का प्रावधान किया गया है। इससे संबंधित भी कोई प्रावधान मनुस्मृति में नहीं मिलता है। इसका कारण भी यही है कि उस समय नदियों के पानी पर लोग लड़ते झगड़ते नहीं थे। नदियों को सबका माना जाता था और नदियों के पानी को प्रदूषित करना भी आप माना जाता था। नदियों की पवित्रता बनाए रखना और पर्यावरण प्रदूषण के प्रति सावधान रहना सभी देशवासी और भूमंडलवासी अपना मौलिक कर्तव्य मानते थे। यह व्यवस्था भी मनुस्मृति और वैदिक संस्कृति के कारण ही बन पाई थी।
आधुनिक विद्वान हमें यह तो बताते हैं कि सभ्यता का धीरे-धीरे विकास हुआ और प्राचीन मानव बहुत ही असभ्य ढंग से जीवन यापन करता था, उसका खाने-पीने, रहने - सहने का ढंग पशुओं से के जैसा ही था। परंतु कोई हमें यह नहीं बताता था कि आज के तथाकथित सभ्य मानव की अपेक्षा उस समय के लोग नदियों के प्रति सावधान क्यों थे ? अथवा नदियों का जल आज की अपेक्षा अधिक पवित्र क्यों रहता था और पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उस समय क्यों नहीं थी ? स्पष्ट है कि लोग अपने कर्तव्यों के प्रति सजग थे।
कर्तव्यों के प्रति सजग वही समाज रह सकता है जो शिक्षित और संस्कारित हो।
केंद्र राज्य संबंधों के प्राविधान
संविधान के अनुच्छेद 268 से लेकर 281 तक संघ और राज्यों के बीच राजस्वों के वितरण संबंधी प्राविधान दिए गए हैं। भारत के वर्तमान संविधान में इनको भी विस्तार से इसलिए दिया गया है कि आजकल राज्य भी केंद्र के प्रति उतने अधिक समर्पित नहीं हैं जितने कभी प्राचीन भारत में चक्रवर्ती सम्राटों के शासनकाल में हुआ करते थे। मनु महाराज ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि कभी राज्य भी केंद्र से अपने हितों के लिए ऐसे लड़ेंगे जैसे दो विपरीत विचारधाराओं के अथवा मान्यताओं या विचारों के व्यक्ति परस्पर लड़ा करते हैं। उस समय ऊपर से नीचे तक वैदिक विद्वान शासन - प्रशासन में बैठे हुआ करते थे। जिन्हें निहित स्वार्थ छूते तक भी नहीं थे। ईमानदार और समझदार लोगों के लिए अधिक कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं पड़ती है, क्योंकि उनके हृदय पहले ही स्वच्छ और ईमानदार होते हैं। अधिक उनके लिए लिखना पड़ता है जो स्वयं बेईमान होते हैं और इस बात के लिए जाने जाते हैं कि वे कानून की बारीकियों में से निकलने का भी रास्ता बना लेंगे। आज सर्वत्र इसी प्रकार की स्थिति बनी हुई है। पढ़े-लिखे लोग शिक्षित तो हैं, परंतु संस्कारित नहीं हैं। इसलिए कानून तोड़ने के लिए नए-नए रास्ते खोजते रहते हैं। जिससे समाज में विशेष प्रकार की बेचैनी अनुभव की जा रही है।
संविधान में प्रदत्त वित्तीय उपबंध
अनुच्छेद 282 से लेकर 291 तक प्रकीर्ण वित्तीय उपबंध दिए गए हैं। जबकि अनुच्छेद 294 से लेकर 300 तक संपत्ति, संविदाएं, अधिकार, दायित्व, बाध्यताएं और वादों से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं। अनुच्छेद 301 से लेकर 307 तक भारत के राज्य-क्षेत्र के भीतर व्यापार , वाणिज्य और समागम के संबंध में प्रावधान दिए गए हैं।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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