"काष्ठ-मौन: एक अंतर्यात्रा"
पंकज शर्मामैं लकड़ियों का ढेर नहीं,
वन का मौन अवशेष हूँ।
चेतना से कटा हुआ,
अपने भीतर परिवेष हूँ।
परम है—या शून्य शेष?
किसने रचा यह तंतु-देश?
न प्रार्थना, न मौन उत्तर,
बस संशय का अवशेष।
समय मुझे कुतरता है,
क्षण-क्षण मेरा क्षय।
कर्ता हूँ या साधन मात्र,
यह प्रश्न बना अभय।
आकाश मौन, धरती जड़,
संवेदनाएँ लुप्त।
मैं टकराता स्वयं से,
अर्थ हुए हैं सुप्त।
न मोक्ष, न स्वर्ग की चाह,
बस अंत:क्षोभ प्रबल।
मैं ही प्रश्न, मैं ही उत्तर,
मैं ही अपना संबल।
जड़ों से दूर खड़ा हूँ,
सूखी एक डाल।
उत्तर अनिश्चित सही,
प्रश्न ही हैं भाल।
छवि दिखती है मुझ-सी,
पर मैं उसमें कहाँ?
रेत-सी यह पहचान,
ठहरती भी नहीं यहाँ।
सब क्षयमान यदि है,
तो शेष क्या रहेगा?
शून्य के उस गर्भ में,
कौन बीज सहेगा?
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित ✍️ "कमल की कलम से"✍️
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