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मानव प्रवृत्ति

मानव प्रवृत्ति

जय प्रकाश कुवंर
हम लड़ते हैं, झगड़ते हैं,
अपनी ही बात पर अड़ते हैं।
अपनी ही कहते जाते हैं,
दूसरों की सुन नहीं पाते हैं।
खुद को विद्वान मानते हैं,
दूसरों को नादान मानते हैं।
यह हम की भावना बहुत बुरी है,
किसी की विद्वता में यह पैनी छुरी है।
सुई छोटी है, कैंची बड़ा है।
सुई सिलाई कर जोड़ती है,
कैंची तो काटने को खड़ा है।
इस जग में ना कोई छोटा है,
ना ही कोई बहुत महान है।
हर काम के लिए हर किसी का,
अपना अपना स्थान है।
ऐ मानव, हम की भावना से उपर उठो,
इसी में तुम्हारी और सबकी भलाई है।
जिसे तुम छोटा समझते हो,
वह भी अपने जगह बड़ा है,
यही वास्तविकता है,
और यही इस जगत की सच्चाई है।
 जय प्रकाश कुवंर
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