सती का मोह एक रोचक ज्ञानवर्धक प्रसंग।

आनन्द हठीला
*एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥
संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥
एक बार त्रेता युग में शिवजी अगस्त्य ऋषि के पास गए। उनके साथ जगज्जननी भवानी सतीजी भी थीं। ऋषि ने संपूर्ण जगत् के ईश्वर जानकर उनका पूजन किया॥ शिवजी माता सती के साथ अगस्त ऋषि के आश्रम पहुंचे वहां राम कथा श्रवण कर उन्हें भक्ति का उपदेश देकर कैलाश लौट रहे थे।
रास्ते में भगवान राम नरलीला कर रहे थे अर्थात सीताजी का पता लता, वृक्ष इत्यादि से पूछ रहे थे। शंकर भगवान अनवसर जानकार भेद खुलजाने के संशय के कारण निकट नहीं गए दूर से प्रसन्न होकर...जय सच्चिदानंद जग पावन॥कहकर प्रणाम किया।
सती को इस पर संदेह हुआ कि कि सर्वज्ञ भगवान शिव ने एक राजा के लड़के को सच्चिदानंद और परधाम कहकर प्रणाम क्यों किया। सच्चिदानंद अर्थात व्यापाक ब्रह्म, अज, अकल, अनीह, अभेद, वह भला नर शरीर धारण क्यों कर सकते हैं।
यदि यह विष्णु भी होते तो भी इस तरह से व्याकुल होकर नारि को खोजते क्यों फिरते, उनसे तो कुछ छिपा नहीं है, इधर भगवान शिव भी सर्वज्ञ हैं इनका कथन भी मिथ्या नहीं हो सकता। सती को शंका हो गई, दुविधिा में फंसी सती ने परीक्षा लेने की ठान ली।
भगवान शिव ने उनके मन की बात जान ली और शंका समाधान के लिए कहा कि जिन रघुनाथ जी की कथा कुंभज ऋषि ने सुनाई यह वही मेरे इष्टदेव भगवान राम हैं।
इस समाधान से सती को बोध नहीं हुआ और परीक्षा लेने की आज्ञा मांगी। सती आज्ञा पाकर सीता जी का रूप धारण कर उस मार्ग पर चली जहां से राम लक्ष्मण आ रहे थे। लेकिन निकट आते ही भगवान राम ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और पूछने लगे आज भोलेनाथ कहां हैं, आप वन में अकेली क्यों फिर रही हैं।
राम के वचन सुनकर सती को अत्यंत संकोच हुआ, विचार करने लगीं अब शिवजी को क्या उत्तर देंगीं। वापस जाने लगी तब मायानाथ ने अपनी माया का साक्षात्कार कराया ताकि सती का संदेह दूर हो जाए। सती मार्ग में देखती हैं... आगे राम सहित श्रीभ्राता....पीछे सहित बंधु सिय सुंदर बेषा चारों ओर भगवान राम विराजमान हैं, सिद्ध, मुनी उनकी सेवा कर रहे हैं।
एक से एक अमित तेज वाले ब्रह्मा, बिष्णु, महेश उनकी चरण बंदना कर रहे हैं, सभी देवता अनेकानेक रूपों में उनकी सेवा में तत्पर हैं। सभी चराचर जीव, अनेक प्रकार के दिख रहे हैं, पर...राम रूप नहीं दूसर देखा....भगवान राम एक ही रूप में सब जगह विद्यमान हैं।
सती कांप गईं, आंखें मूंद कर बैठ गर्इं, कुछ देर बात जब आंखें खोलीं तो वहां कुछ भी नहीं था। सती वापस शिवजी के पास आईं और बोलीं.. कछु न परीक्षा लीन्ह गोसांई, कीन्ह प्रणाम तुम्हारे नाईं...लेकिन भोलेनाथ ने सब जान लिया और लंबी समाधी में चले गए।
सती ने दुखी होकर भगवान राम का स्मरण किया और प्रार्थना की... छूटहि बेगी देह यह मोरी...प्रभु ने प्रार्थना स्वीकार कर ली और अपने पिता दक्ष के यहां यज्ञ में योगाग्नि से शरीर त्यागकर हिमवान के यहां पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया।
कुछ समय पश्चात घोर तपस्या करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया। यहां क्षमा मांगते हुए पुन: वही प्रश्न किया,..आप जिनका दिन रात जाप करते हैं, वेद-पुराण, शेष, शारद जिनका गुणगान करते हैं, ऋणिजन जिन्हें अनादि ब्रह्म कहते हैं, वे कौन हैं, कृपाकर मुझे बताएं।
इसके उत्तर में भगवान शिव पहले तो संशय मात्र से क्रोधित होते हैं और कुछ कड़वे वचन का प्रयोग करते हैं... तुम्ह जो कहा राम कोऊ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ज्ञाना कहहिं सुन्हहिं अस अधम नर, ग्रसे जे मोह पिसाच पाखंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न सांच...इत्यादि शिव को राम पर संदेह भी बर्दाश्त नहीं है।
परंतु पार्वती भयभीत न हों इसलिए उन्हें धन्वाद देते हैं कि आपकी इस जिज्ञासा से रामकथा का वर्णन होगा। सुनु गिरराजुकुमारि भ्रम तम रबि कर बचन सम...अर्थात निश्चयात्मक, नि:शेष भ्रम रहित मेरे वचन सुनो अगुन, अरूप, अलख, अज जोई। भगत प्रेम बस सगुण सो होई अगुण, अज, अखल, अरूप, सर्वव्यापक, सच्चिदानंद, ब्रह्म ही भक्तों के प्रेमबस होकर सगुण रूप धारण करते हैं।
अत: श्रीराम व्यापक परमानंद ब्रह्म हैं। वही मेरे स्वामी रघुकुलमणि श्रीराम मेरे स्वामी हैं, ऐसा कहके शिव ने अपना सीस झुकाया। भोलेनाथ के इन बचनों को सुनकर पार्वती का भ्रम दूर हो गया
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